सुप्रीम कोर्ट (SC) ने 13 मार्च 2026 को देश भर में छात्राओं और कामकाजी महिलाओं के लिए अनिवार्य पीरियड्स लीव (Menstrual Leave) की मांग करने वाली एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान निम्नलिखित प्रमुख टिप्पणियाँ कीं:
- नौकरी मिलने में बाधा: CJI ने कहा कि यदि पीरियड्स लीव को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाया जाता है, तो नियोक्ता (employers) महिलाओं को काम पर रखने से हिचकिचा सकते हैं। इससे महिलाओं के रोजगार के अवसर कम हो सकते हैं और उनका करियर प्रभावित हो सकता है।
- नकारात्मक धारणा का डर: कोर्ट ने चिंता जताई कि इस तरह का कानून एक “मनोवैज्ञानिक डर” पैदा कर सकता है कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में कम सक्षम हैं। यह कदम अनजाने में महिलाओं के प्रति रूढ़ियों (stereotypes) को और मजबूत कर सकता है।
- स्वैच्छिक बनाम अनिवार्य: पीठ ने कहा कि यदि कोई संस्थान अपनी मर्जी से यह छुट्टी देता है तो वह सराहनीय है, लेकिन इसे कानून के जरिए अनिवार्य करना महिलाओं के लिए नुकसानदेह साबित होगा।
- नीतिगत मामला: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मुद्दा सरकारी नीति (Policy Matter) के दायरे में आता है। इससे पहले जुलाई 2024 में, तत्कालीन CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ की पीठ ने भी केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि वह राज्यों के साथ परामर्श कर इस पर एक “मॉडल नीति” तैयार करने पर विचार करे।
अदालत का रुख:
अदालत ने याचिकाकर्ता (वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी) को निर्देश दिया कि वे महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के समक्ष अपनी बात रखें। कोर्ट ने माना कि पीरियड्स के दौरान स्वच्छता और स्वास्थ्य मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21) का हिस्सा हैं, लेकिन छुट्टी को अनिवार्य बनाना एक अलग प्रशासनिक विषय है।
