मुरादाबाद। कभी बेकार समझा जाने वाला गाय का गोबर अब महिलाओं के लिए आय का मजबूत साधन बन गया है। मुरादाबाद की कान्हा गौशाला में स्वयं सहायता समूह की महिलाएं गोबर और मंदिरों में चढ़ने वाले फूलों के अपशिष्ट से कई उपयोगी और आकर्षक उत्पाद तैयार कर रही हैं। इस पहल से एक ओर पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर महिलाएं रोजाना करीब 500 रुपये तक की कमाई कर आर्थिक रूप से सशक्त बन रही हैं।
गोबर से तैयार हो रहे धार्मिक और सजावटी उत्पाद
कान्हा गौशाला में प्रशिक्षक अमरीश शर्मा के मार्गदर्शन में महिलाएं गोबर से कई तरह के इको-फ्रेंडली उत्पाद बना रही हैं। समूह की सदस्य राधा के अनुसार यहां गणेश, लक्ष्मी और सरस्वती की प्रतिमाएं, धूपबत्ती, अगरबत्ती, गोल और चौकोर उपले, लक्ष्मी चरण, ‘ओम’ और ‘स्वास्तिक’ जैसे धार्मिक प्रतीक तैयार किए जा रहे हैं। इन उत्पादों की मांग बाजार में लगातार बढ़ रही है।
इसके अलावा मंदिरों में चढ़ने वाले फूलों को फेंकने के बजाय उन्हें सुखाकर और पीसकर गोबर में मिलाया जाता है, जिससे खास तरह की सुगंधित धूपबत्ती तैयार की जाती है। यहां ‘दीप यज्ञ कृपा किट’ भी बनाई जा रही है, जिसमें हवन कुंड, गोबर के दीये, समिधा और हवन सामग्री शामिल रहती है।

होली के अवसर पर महिलाओं ने गोबर से विशेष मालाएं भी तैयार कीं, जिन्हें स्थानीय बाजार में 20 रुपये प्रति माला के हिसाब से बेचा गया। इनकी लागत बहुत कम होती है, क्योंकि एक माला बनाने में लगभग 4 से 5 किलो गोबर ही लगता है।
वर्मी कम्पोस्ट और सजावटी सामान भी तैयार
गौशाला में गोबर के साथ केंचुओं की मदद से वर्मी कम्पोस्ट यानी जैविक खाद भी तैयार की जा रही है, जो पौधों की वृद्धि के लिए बेहद उपयोगी मानी जाती है। इसके अलावा महिलाएं सॉफ्ट टॉय, लटकन, बंधनवार और लकड़ी से बने सजावटी उत्पाद भी तैयार कर रही हैं।
120 से अधिक स्वयं सहायता समूह जुड़े
इस पहल से ‘कैलाश’ और ‘रहमत’ जैसे स्वयं सहायता समूह जुड़े हुए हैं, जिनकी सचिव राधा और जबल निशा हैं। दस-दस महिलाओं के पांच समूहों को मिलाकर ‘राधा महिला प्रेरणा ग्राम संगठन’ बनाया गया है, जबकि सीएलएफ के तहत करीब 120 स्वयं सहायता समूह इस गतिविधि से जुड़े हुए हैं।
नगर स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. नरेंद्र सिंह कुमार के निर्देशन में कान्हा गौशाला में सीधे तौर पर दो समूह काम कर रहे हैं, जिनमें लगभग 20 से 22 महिलाएं शामिल हैं। प्रशिक्षक अमरीश शर्मा अब तक चार समूहों को गो-उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण दे चुके हैं।
मेलों और महोत्सवों में बढ़ रही मांग
इन उत्पादों की मांग स्थानीय बाजार के साथ-साथ सरकारी मेलों और सांस्कृतिक आयोजनों में भी काफी बढ़ रही है। उदीषा चौपाल साहित्य उत्सव में लगाए गए स्टॉल पर महिलाओं ने एक ही दिन में 5 से 6 हजार रुपये की बिक्री की थी। वहीं एक स्थानीय मेले में तीन दिन के भीतर 17 से 18 हजार रुपये तक के उत्पाद बिके। दीपावली के दौरान गोबर के दीये 3 से 10 रुपये प्रति पीस तक बिके, जिनकी काफी मांग रही।
स्वच्छता के लिए अनोखा अभियान
महिलाएं पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए ‘प्लास्टिक लाओ, पूजा सामग्री ले जाओ’ नाम से एक अनूठा अभियान भी चला रही हैं। इसके तहत लोगों को प्लास्टिक कचरा डस्टबिन में डालने के लिए प्रेरित किया जाता है और खाली बोतलों में प्लास्टिक भरकर इको-ब्रिक्स तैयार किए जाते हैं।
नगर निगम और एनआरएलएम का सहयोग
इस पहल को आगे बढ़ाने में नगर निगम और राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) का महत्वपूर्ण योगदान है। एनआरएलएम की ओर से ब्लॉक स्तर पर मशीनों और गोबर पाउडर बनाने की व्यवस्था के लिए 1 से 1.5 लाख रुपये तक की सहायता दी गई है। वहीं नगर निगम ने कान्हा गौशाला में बड़ी मशीनें स्थापित कराई हैं।
उत्पादों की बिक्री को आसान बनाने के लिए नगर निगम ने शहर में एक आउटलेट भी शुरू कराया है, जहां इन गो-उत्पादों को खरीदा जा सकता है। इस पूरी पहल ने न केवल महिलाओं की आय बढ़ाई है, बल्कि स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक नई मिसाल पेश की है।
