अमरोहा। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक के बीते रविवार- सोमवार के दो दिवसीय दौरे के बीच जिले में एक नई राजनीतिक विद्रूपता उभरकर सामने आई है। प्रशासनिक अमला जहाँ वीवीआईपी सुरक्षा में व्यस्त है, वहीं स्थानीय अखबारों के दफ्तर उन तथाकथित किसान संगठनों की प्रेस विज्ञप्तियों से पटे पड़े हैं, जिनमें आंदोलनों की रणनीति के बजाय खुद के ‘नजरबंद’ होने की गुहार और फोटो छापने की ‘स्वैच्छिक विनती’ दर्ज है। कभी दमन का प्रतीक मानी जाने वाली ‘नजरबंदी’ अब इन संगठनों के लिए किसी ‘फेस्टिवल सेल’ की तरह हो गई है, जहाँ अपनी डूबती प्रासंगिकता को बचाने के लिए खाकी के पहरे की ‘भीख’ मांगी जा रही है।
जानकारों की मानें तो जमीन पर आधार खो चुके इन कथित नेताओं के लिए हाउस अरेस्ट अब एक सुरक्षित ‘स्टेटस सिंबल’ बन गया है। आलम यह है कि खुद को किसानों का मसीहा साबित करने की होड़ में ये पदाधिकारी स्वयं पुलिस अधिकारियों को फोन कर अपने दरवाजे पर सिपाही खड़े करने का आग्रह कर रहे हैं, ताकि ड्राइंग रूम के सौफे पर बैठकर की गई इस ‘सेटिंग’ को सरकारी खौफ का नाम दिया जा सके।

विडंबना देखिए कि जब पुलिस प्रशासन किसी संगठन को सुरक्षा के लिहाज से ‘खतरा’ मानना ही छोड़ दे, तो वह उसकी राजनीतिक मृत्यु के समान है और अमरोहा में यही हो रहा है। स्थानीय पुलिस द्वारा उपेक्षित किए जाने पर ये नेता अब विज्ञप्तियों का सहारा लेकर यह भ्रम पैदा करने में जुटे हैं कि सरकार उनकी ‘धमक’ से सहमी हुई है। लेकिन पुलिस का भी स्पष्ट रुख़ है कि नेता जी तुम खुले घूमों या घर बैठो हमें इससे कोई ज्यादा मतलब नहीं है।
राजनीतिक गलियारों में यह ‘चिरौरी संस्कृति’ चर्चा का विषय बनी हुई है, जहाँ संघर्ष की रूह मर चुकी है और आंदोलन सड़कों के बजाय सोफे पर अधिक सुरक्षित नजर आ रहे हैं। धूप में पसीना बहाने और भीड़ जुटाने की जहमत से बचने के लिए ‘हाउस अरेस्ट’ को एक गरिमामय निकास द्वार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। अखबारों में लगे विज्ञप्तियों के ये ढेर दरअसल उन संगठनों का ‘शोक संदेश’ हैं, जो अब जनसमर्थन के अभाव में पुलिस के एहसान पर अपनी राजनीति चमकाना चाहते हैं। लोकतंत्र के लिए यह स्थिति सुखद नहीं है, क्योंकि जब तक नेता सड़कों की धूल नहीं फांकेंगे, तब तक उनके यह ‘स्वैच्छिक नजरबंदी’ के ड्रामे जनता के बीच केवल उपहास और विद्रूपता का ही पात्र बनेंगे।
