नई दिल्ली। चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के भीतर लिए जा रहे फैसलों पर सवाल तब और गंभीर हो जाते हैं, जब उन्हीं फैसलों को लेकर आयोग के दो निर्वाचन आयुक्त रिकॉर्ड पर आपत्ति दर्ज कराएं। द इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकार रितिका चोपड़ा की हालिया खोजी रिपोर्ट ने चुनाव आयोग के कामकाज से जुड़े ऐसे ही दस्तावेजों और आपत्तियों को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
23 सितंबर 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट में दावा किया गया कि निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों के दौरान आयोग के विभिन्न फैसलों और प्रक्रियाओं पर कई बार आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों आयुक्तों की आपत्तियों में चुनावी रोल के डेटाबेस, आईटी व्यवस्था, मतदाता पंजीकरण और विशेष रूप से Form 6 में किए गए बदलाव जैसे मुद्दे शामिल थे।
Form 6 पर दर्ज आपत्तियों ने बढ़ाया विवाद
रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा नए मतदाताओं के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 से जुड़ा है। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, ऑनलाइन प्रक्रिया में ऐसा अतिरिक्त घोषणा-पत्र सामने आया, जिसमें आवेदक से यह बताने को कहा गया कि उसका, उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची में दर्ज था या नहीं।
रिपोर्ट के अनुसार विवेक जोशी ने मई में आपत्ति दर्ज करते हुए कहा कि नियमों में बदलाव किए बिना वैधानिक Form 6 को इस तरह बदला नहीं जा सकता। सुखबीर सिंह संधू ने भी इस आपत्ति से सहमति जताई और बाद में बदलाव को “unauthorised” तथा “illegal” बताते हुए तत्काल हटाने की बात कही।
हालांकि, चुनाव आयोग की ओर से बाद में यह स्पष्ट किया गया कि Form 6 में मूल रूप से कोई बदलाव नहीं किया गया था, बल्कि SIR से संबंधित एक अतिरिक्त घोषणा-पत्र जोड़ा गया था। आयोग ने इसे 2025 में जारी निर्देशों के अनुरूप बताया।
यानी विवाद केवल एक ऑनलाइन फॉर्म का नहीं है। इसके केंद्र में यह सवाल है कि वैधानिक प्रक्रिया और आयोग के प्रशासनिक निर्देशों के बीच सीमा कहां तय होती है।
रिपोर्टिंग का केंद्र दस्तावेज, दावे नहीं
रितिका चोपड़ा की रिपोर्ट की खासियत यही है कि इसमें चुनाव आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों और आधिकारिक प्रक्रिया को आधार बनाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार दोनों निर्वाचन आयुक्तों की आपत्तियां मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार तक भी पहुंची थीं।
इसी वजह से यह मामला राजनीतिक बयानबाजी से आगे बढ़कर संस्थागत कामकाज, निर्णय लेने की प्रक्रिया और चुनावी प्रशासन में पारदर्शिता से जुड़े सवालों को सामने रखता है।
कौन हैं रितिका चोपड़ा?
रितिका चोपड़ा की पत्रकारिता यात्रा कोलकाता से शुरू हुई। द इंडियन एक्सप्रेस के आधिकारिक प्रोफाइल के अनुसार उन्होंने 2006 में हिंदुस्तान टाइम्स में इंटर्न के तौर पर शुरुआत की और बाद में द इकोनॉमिक टाइम्स, मेल टुडे तथा अन्य संस्थानों में काम किया। वर्ष 2015 में वह द इंडियन एक्सप्रेस से जुड़ीं। वह राजनीति, शासन, शिक्षा और चुनाव आयोग से जुड़े विषयों पर लंबे समय से रिपोर्टिंग कर रही हैं।
चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उनकी रिपोर्टिंग को 2021 के रामनाथ गोयनका एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म अवॉर्ड में Reporting on Politics and Government श्रेणी में सम्मान मिला। अवॉर्ड रिकॉर्ड के अनुसार यह सम्मान चुनाव आयोग की अंदरूनी कार्यप्रणाली पर उनकी रिपोर्टों की श्रृंखला के लिए था।
इसके अलावा 2024 में रितिका चोपड़ा और स्वतंत्र पत्रकार ग्रीष्मा कुथार को संयुक्त रूप से चमेली देवी जैन अवॉर्ड फॉर आउटस्टैंडिंग वुमन मीडिया पर्सन ऑफ द ईयर दिया गया।
पत्रकारिता का मतलब सिर्फ खबर लिखना नहीं
रितिका चोपड़ा की हालिया रिपोर्ट एक बार फिर यह सवाल सामने लाती है कि संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज की पड़ताल पत्रकारिता किस तरह करती है। किसी संस्था पर सवाल उठाना और किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना दो अलग बातें हैं। लेकिन दस्तावेजों, रिकॉर्ड पर दर्ज आपत्तियों और आधिकारिक प्रतिक्रियाओं को सामने रखना लोकतांत्रिक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
जब सत्ता, संस्थाओं और प्रक्रियाओं से जुड़े फैसलों पर सवाल उठते हैं, तब पत्रकार का काम किसी निष्कर्ष को थोपना नहीं, बल्कि उन तथ्यों और दस्तावेजों को जनता के सामने रखना है जिनके आधार पर नागरिक स्वयं सवाल पूछ सकें।
और शायद यही खोजी पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत है—शोर से ज्यादा दस्तावेज, आरोप से ज्यादा तथ्य और दावे से ज्यादा सवाल@INN
