कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने कहा- हमारे संसद में राष्ट्रीय गीत पर चर्चा हो रही है. जो एक भावना के ऊपर है. जब हम वंदे मातरम् का नाम लेते हैं. तो वही भावना उजागर होती है. स्वतंत्रता संग्राम की याद दिलाता है. उसका साहस, बल, नैतिकता याद दिलाता है. ब्रिटिश साम्राज्य इसके सामने झुका,
प्रियंका गांधी ने कहा- ये गीत 150 साल से देश की आत्मा का हिस्सा है. देश क लोगों के दिल में बसा है. 75 साल से ये देश में है. आज इस पर बहस की चर्चा क्यों हो रही है. मकसद क्या है इसका. जनता का विश्वास, दायित्व उनके प्रति हमारी जिम्मेदारी हम कैसे निर्वाहन कर रहे हैं. कांग्रेस सासंद ने कहा, “बंगाल में चुनाव के कारण वंदे मातरम पर बहस कराई जा रही है. इसका मकसद पुराने नायकों पर आरोप लगाना है. सरकार लोगों को बांटना चाहती है.”
प्रियंका गांधी ने कहा कि ‘आपका मकसद है इसी अतीत में मंडराते रहें. जो हो चुका है, जो बीत चुका है, ये सरकार वर्तमान, भविष्य की ओर देखना नहीं चाहते. आज मोदी जी वो पीएम नहीं रहे जो पहले थे. उन्होंने आगे कहा- ये दिखने लगा है. इनकी नीतियां देश को कमजोर कर रही हैं. सत्ता पक्ष के लोग भी इससे सहमत हैं, इसलिए चुप हैं. देश को लोग तमाम समस्याओं से घिरे हैं. इनके पास इसका हल नहीं है. कल समय आ रहा है चुनाव पर चर्चा होगी, उस पर भी बोलेंगे.
कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने कहा- आज इस चर्चा को पीएम ने शुरू किया. भाषण दिया- कहने में कोई झिझक नहीं है कि भाषण अच्छा देते हैं, बस थोड़ा लंबा है. बस एक कमजोरी है उनकी- तथ्यों के मामले में कमजोर हो जाते हैं. मैं तो जनता की प्रतिनिधि हूं कलाकार नहीं हूं. प्रियंका गांधी ने यह भी कहा कि- ‘तथ्यों को तथ्य के रूप में सदन में रखना चाहती हूं. वंदे मातरम् की वर्षगांठ पर आयोजित कार्यक्रम में पीएम ने कहा 1896 में रवींद्र नाथ ने ये एक अधिवेशन में ये गीत गाया, ये अधिवेशन कांग्रेस का था. वंदे मातरम् की क्रोनॉलॉजी में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने पहले दो अंतरे लिखे. 1882 में उपन्यास आनंदमठ प्रकाशित किया, इसमें चार अंतरे और जोड़े गए.
प्रियंका गांधी ने कहा कि 1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने यह गीत गाया. 1905 में रवींद्रनाथ टैगोर ये गीत गाते हुए ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ लड़ाई में उतरे. ये गीत मातृभूमि के लिए मर मिटने की भावना को जगाता है. 1930 के दशक में सांप्रदायिक की राजनीति उभरी तब ये गीत विवादित होने लगा. उन्होंने आगे कहा कि 1937 में नेताजी कोलकाता में कांग्रेस अधिवेशन का आयोजन कर रहे थे. 20 अक्टूबर का लेटर उन्होंने सुनाया, लेकिन इससे पहले उन्होंने नेहरू को एक चिठ्ठी लिखी थी, इसका पीएम मोदी ने जिक्र नहीं किया.
