अमरोहा। इंदौर की दूषित जल त्रासदी के बाद अब गजरौला की भूजल आपदा देश के सामने एक और भयावह सच बनकर खड़ी है। यह केवल पर्यावरण संकट नहीं, बल्कि शासन, सिस्टम और जवाबदेही के पूर्ण पतन की कहानी है। यहां रासायनिक कारखाने बेखौफ मुनाफा कमा रहे हैं, अफसर गेस्ट हाउसों में सुरक्षित हैं और ग्रामीण जानलेवा बीमारियों से जूझते हुए अस्पतालों की चौखट पर पड़े हैं।

गजरौला शहबाजपुर डोर में पिछले 13 दिनों से चल रहे किसान आंदोलन को संबोधित करते हुए जिला पंचायत सदस्य धर्मपाल सिंह खड़गवंशी ने कहा कि जब तक ग्रामीणों को स्वच्छ पेयजल जैसी मूलभूत सुविधा नहीं मिलेगी, तब तक स्वच्छता पुरस्कार, चमकदार विज्ञापन और सरकारी रैंकिंग महज़ दिखावा हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यहां का ज़हरीला भूजल किसी दुर्घटना का नहीं, बल्कि सड़ चुके सिस्टम की देन है।
उन्होंने कहा कि जागरूक किसान पिछले दो हफ्तों से दिन-रात धरने पर बैठे हैं और शनिवार को आंदोलन 14वें दिन में प्रवेश कर गया। बावजूद इसके, शासन और प्रशासन की चुप्पी इस बात का प्रमाण है कि गरीब की मजबूरी पर चलने वाला सिस्टम ताकतवरों की सुविधा के आगे झुक चुका है।
धर्मपाल सिंह खड़गवंशी ने आरोप लगाया कि व्यवस्था का संदेश साफ है—“रासायनिक कारखानों, तुम ज़मीन और पानी को ज़हरीला करो, हम तुम्हारे साथ हैं। न जांच होगी, न कार्रवाई।” उन्होंने कहा कि क्षेत्र में कैंसर, लीवर सूजन, हार्ट अटैक जैसी जानलेवा बीमारियों का अचानक बढ़ना कोई संयोग नहीं, बल्कि ज़हर को व्यवस्थित तरीके से परोसने का नतीजा है। यदि किसी अंतरराष्ट्रीय स्वतंत्र एजेंसी से ईमानदार जांच कराई जाए, तो असली दोषी बेनकाब हो सकते हैं।
उन्होंने कहा कि निरीक्षण कागज़ों तक सीमित हैं, सैंपल रिपोर्ट फाइलों में दबी हैं और कार्रवाई सिर्फ घोषणाओं तक सिमट गई है। सर्टिफिकेशन पाना आसान है, दोषी पाए जाने पर बच निकलना उससे भी आसान, लेकिन जवाबदेही पूरी तरह शून्य है।
भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने कहा कि देश की नियामक संस्थाएं आंखें मूंदे बैठी हैं। यह तंत्र आज राज्य के सबसे भ्रष्ट और गैर-जवाबदेह ढांचों में शामिल हो चुका है। नियम आम आदमी के लिए हैं, जबकि ताकतवरों और माफियाओं के लिए रास्ते हमेशा खुले रहते हैं। उन्होंने इसे प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि जनता की सेहत के खिलाफ संगठित अपराध करार दिया।
नरेश चौधरी ने चेतावनी दी कि यह किसी व्यक्ति की निजी समस्या नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की सामूहिक पीड़ा है। लोग जवाब, कार्रवाई और जिम्मेदारी तय होते देखना चाहते हैं। यह किसी राजनीतिक एजेंडे की नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य की लड़ाई है। अगर इसे अभी नहीं रोका गया, तो गजरौला को ‘कैंसर की राजधानी’ बनने से कोई नहीं बचा पाएगा।
इस मौके पर भाकियू संयुक्त मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष (एससी मोर्चा) रिंकू सागर, अमरजीत देओल, आज़म खान, दिनेश सिंह, मंसूर अली, सानू चौधरी, रिफाकत चौधरी, सुरेश सिंह, ओमपाल सिंह सहित बड़ी संख्या में किसान मौजूद रहे।
