Oplus_16908288
गजरौला। हाड़ कंपा देने वाली ठंड, खुले आसमान के नीचे 15 दिन का अनिश्चितकालीन धरना और जहरीले पानी से बर्बाद होती फसलें—यह तस्वीर है अमरोहा जिले के गजरौला क्षेत्र स्थित शहबाजपुर डोर गांव की, जहां किसान कैमिकल युक्त औद्योगिक अपशिष्ट जल से फैल रहे भूजल प्रदूषण के खिलाफ सड़क पर उतरने को मजबूर हैं। सवाल यह है कि जब किसानों का पानी ज़हर बन चुका है, तो प्रशासन अब तक चुप क्यों है?
भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के बैनर तले चल रहे इस आंदोलन में रविवार को उत्तर प्रदेश पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन आयोग के सदस्य कारी फतेहउद्दीन खान कादरी ने धरनास्थल पर पहुंचकर न केवल किसानों का हौसला बढ़ाया, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही पर सीधा सवाल भी खड़ा कर दिया।

जांच रिपोर्ट कहां हैं? किसे बचा रहा सिस्टम?
कारी फतेहउद्दीन खान कादरी ने जिलाधिकारी निधि गुप्ता वत्स को स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा कि भूजल, मृदा और वायु प्रदूषण से संबंधित सभी विभागीय जांच रिपोर्ट तत्काल सार्वजनिक की जाएं। उन्होंने दो टूक कहा कि यदि प्रदूषण साबित है, तो दोषी औद्योगिक इकाइयों पर कठोरतम कार्रवाई होनी चाहिए—ना कि फाइलों में मामला दबाया जाए।
उन्होंने चेताया कि प्रदूषित जल के कारण ग्रामीणों के स्वास्थ्य, मवेशियों और खेती पर पड़ रहे घातक प्रभावों की विशेषज्ञों से जांच कराई जाए और इलाज सुनिश्चित किया जाए। सवाल यह भी है कि जब फसलें चौपट हो रही हैं और लोग बीमार पड़ रहे हैं, तब तक रिपोर्ट क्यों छिपाई गई?

इंदौर जैसी त्रासदी का इंतज़ार क्यों?
हाल ही में इंदौर में दूषित पेयजल से हुई भयावह त्रासदी के बाद उत्तर प्रदेश पर्यावरण आयोग ने गजरौला भूजल प्रदूषण मामले पर स्वतः संज्ञान लिया। आयोग सदस्य कारी फतेहउद्दीन खान कादरी ने साफ कहा कि गजरौला अब सिर्फ़ स्थानीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर का पर्यावरणीय संकट बन चुका है।
धरनास्थल से ही कादरी ने प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य से फोन पर बात कर पूरे प्रकरण की गंभीरता बताई, जिस पर उपमुख्यमंत्री ने शीघ्र जांच और समाधान का भरोसा दिया। सवाल उठता है कि अगर आयोग और उपमुख्यमंत्री तक मामला पहुंच चुका है, तो ज़मीनी कार्रवाई कब होगी?

ज़हर उगलती फैक्ट्रियां, खामोश अफसर
किसानों का आरोप है कि गजरौला की औद्योगिक इकाइयां नदियों और भूजल स्रोतों में खुलेआम कैमिकल युक्त अपशिष्ट जल छोड़ रही हैं, जिससे खेत बंजर होते जा रहे हैं और गांवों में गंभीर बीमारियां बढ़ रही हैं। इसके बावजूद प्रशासनिक अफसर या तो अंजान बने हैं या जानबूझकर आंखें मूंदे हुए हैं।
गजरौला क्षेत्र वर्षों से औद्योगिक प्रदूषण झेल रहा है। किसानों ने साफ चेतावनी दी है कि जब तक जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं होती और प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों पर कार्रवाई नहीं होती, तब तक धरना जारी रहेगा।

जनस्वास्थ्य बनाम उद्योग—किसकी जीत?
यह मामला अब केवल किसानों की लड़ाई नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण बनाम औद्योगिक मुनाफाखोरी की जंग बन चुका है। पर्यावरण आयोग की सक्रियता से किसानों में उम्मीद जगी है कि शायद अब ज़हर बेचने वालों पर शिकंजा कसा जाएगा।
धरनास्थल पर भाकियू संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी, प्रमुख सचिव अरुण सिद्धू, पूर्व जिला पंचायत सदस्य एवं शिक्षाविद डॉ. जयपाल सिंह, प्रदेशाध्यक्ष रामकृष्ण चौहान, रिंकू सागर, आज़म खान, तेजपाल सिंह, असलम चौधरी, चौधरी चरण सिंह, आसिफ चौधरी, एडवोकेट जर्रार अहमद, अमरजीत देवल, दानिश चौधरी, हैदर चौधरी, विनीत तोमर, अंकित त्यागी सहित बड़ी संख्या में किसान मौजूद रहे।
