गजरौला (अमरोहा)। कैमिकल युक्त औद्योगिक अपशिष्ट जल से उपजे भूजल प्रदूषण के खिलाफ गजरौला में किसानों का सब्र अब जवाब दे चुका है। राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी के नेतृत्व में भारतीय किसान यूनियन (संयुक्त मोर्चा) के बैनर तले किसान बीते 14 दिनों से सड़क पर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे हैं, लेकिन प्रशासन की संवेदनहीनता और चुप्पी ने आंदोलन को और उग्र बना दिया है। किसानों का साफ आरोप है कि औद्योगिक प्रबंधन और प्रशासन के गठजोड़ के चलते उनकी जान की कीमत शून्य हो चुकी है।
ज़मीन का पानी बना ज़हर, खेती और जिंदगी दोनों बर्बाद
स्थानीय किसानों का कहना है कि बीते 10 से 15 वर्षों से क्षेत्र में बहाए जा रहे कैमिकल युक्त औद्योगिक अपशिष्ट जल ने भूजल को पूरी तरह जहरीला बना दिया है। हालात यह हैं कि न तो यह पानी पीने योग्य बचा है और न ही खेती के लायक। फसलें नष्ट हो रही हैं, जमीन की उर्वरता खत्म हो रही है और पशुधन तक बीमार पड़ रहा है।
कैंसर से त्वचा रोग तक—गांव बनते जा रहे बीमारी के केंद्र
धरनास्थल पर मौजूद किसानों ने बताया कि दूषित पानी के कारण गांवों में कैंसर, किडनी फेलियर, त्वचा रोग, सांस की बीमारियां और पेट की गंभीर समस्याएं तेजी से बढ़ी हैं। कई परिवारों में बीमारी स्थायी मेहमान बन चुकी है। इलाज के नाम पर किसान कर्ज में डूबते जा रहे हैं, जमीनें बिक रही हैं और कई घर उजड़ चुके हैं।
14 दिन का धरना, एक भी ठोस कार्रवाई नहीं
किसानों का कहना है कि इतने लंबे धरने के बावजूद न तो कोई उच्च अधिकारी मौके पर पहुंचा, न ही प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों पर कोई सख्त कार्रवाई हुई। सिर्फ आश्वासन और खानापूर्ति की जांचों से किसानों का गुस्सा और भड़क गया है। धरनारत किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द समाधान नहीं हुआ तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा।
“उद्योग चलें, किसान मरें”—यही नीति?
किसानों का सीधा आरोप है कि प्रशासन की प्राथमिकता उद्योगों का मुनाफा है, न कि किसानों का जीवन। प्रदूषण फैलाने वाली फैक्ट्रियों पर कार्रवाई के बजाय उन्हें संरक्षण दिया जा रहा है। सवाल उठ रहा है कि क्या कानून सिर्फ कमजोरों के लिए है और ताकतवर उद्योग नियमों से ऊपर हैं?
किसान यूनियन की मांगें
भारतीय किसान यूनियन (संयुक्त मोर्चा) ने मांग की है कि :
1. दोषी औद्योगिक इकाइयों को तत्काल सील किया जाए
2. स्वतंत्र एजेंसी से भूजल और मिट्टी की जांच हो
3. पीड़ित किसानों को मुआवजा और मुफ्त इलाज की व्यवस्था हो
4. शुद्ध पेयजल की स्थायी व्यवस्था की जाए
चेतावनी
किसानों ने साफ शब्दों में कहा है—अगर अब भी प्रशासन नहीं जागा तो यह आंदोलन सिर्फ गजरौला तक सीमित नहीं रहेगा। यह लड़ाई जमीन, पानी और जीवन बचाने की है, और इसमें पीछे हटने का सवाल ही नहीं।
गजरौला आज एक बार फिर पूछ रहा है—क्या किसान की जान से बड़ा कोई उद्योग है?
