भूजल प्रदूषण का बम: गजरौला के 40 गांव संकट की दहलीज़ पर
अमरोहा। मध्य प्रदेश के इंदौर में दूषित पेयजल से हुई मौतों की घटना ने देशभर को झकझोर दिया है, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश के औद्योगिक क्षेत्र गजरौला में यह हादसा महज खबर नहीं, बल्कि आने वाले खतरे की साफ चेतावनी बनकर उभरा है। वर्षों से भूजल प्रदूषण की मार झेल रहे गजरौला और आसपास के इलाकों में रहने वाले लोग आशंकित हैं कि यदि समय रहते ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो यहां भी इंदौर जैसे हालात बन सकते हैं।
इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में सीवेज मिश्रित पानी की आपूर्ति से फैली बीमारी और 10 से 16 लोगों की मौत ने यह साबित कर दिया कि जल प्रदूषण की अनदेखी कितनी भयावह साबित हो सकती है। लंबे समय से पानी की बदबू, रंग बदलने और शिकायतों के बावजूद प्रशासन की निष्क्रियता वहां जानलेवा साबित हुई। यही तस्वीर अब गजरौला में भी दिखाई दे रही है।
गजरौला औद्योगिक क्षेत्र में स्थापित बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों पर लंबे समय से पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन के आरोप लगते रहे हैं। पुरानी जांच रिपोर्टों में भूजल में भारी धातुओं और रासायनिक तत्वों की मौजूदगी सामने आ चुकी है। इसके बावजूद न तो स्थायी समाधान निकला और न ही दोषियों पर ऐसी सख्त कार्रवाई हुई, जो भविष्य के लिए नजीर बन सके।

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि कई इलाकों में नलों से पीला, बदबूदार और झागदार पानी आ रहा है। बच्चों में पेट संबंधी बीमारियां, महिलाओं में त्वचा और हार्मोनल समस्याएं तथा बुजुर्गों में गंभीर संक्रमण आम होते जा रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि कई घरों में पानी उबालना या बाहर से पानी खरीदना मजबूरी बन चुका है। अमरोहा जिले के करीब 40 गांव इस संकट की चपेट में बताए जा रहे हैं।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) द्वारा पूर्व में की गई कार्रवाइयों के बावजूद जमीनी हकीकत नहीं बदली। विशेषज्ञ मानते हैं कि औद्योगिक अपशिष्टों का अनियंत्रित निस्तारण, दिखावटी सैंपलिंग, कागजी अनुपालन और कमजोर दंड व्यवस्था इस संकट की जड़ हैं। कॉर्पोरेट जवाबदेही कागजों तक सीमित रह जाती है, जबकि शिकायतों का फॉलोअप लगभग शून्य है।
सर्वोच्च न्यायालय कई फैसलों में साफ कह चुका है कि स्वच्छ जल और स्वच्छ वातावरण जीवन के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद-21) का अभिन्न हिस्सा है। इसके बावजूद ग्रामीण इलाकों में सुरक्षित पेयजल आज भी एक अधूरा सपना बना हुआ है। सरकारें स्वच्छ भारत और विकास के दावे करती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत उन दावों को खोखला साबित कर रही है।
स्थानीय लोगों ने चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन ने अब भी आंखें मूंदे रखीं, तो गजरौला किसी बड़े जल-जनित हादसे का अगला नाम हो सकता है।

जरूरत है स्वतंत्र और पारदर्शी जांच की, प्रदूषण फैलाने वाले स्रोतों को सील करने की और प्रभावित इलाकों में तत्काल स्वच्छ वैकल्पिक जल आपूर्ति सुनिश्चित करने की। जनता की सेहत के साथ खिलवाड़ केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि गंभीर अपराध है। इंदौर की त्रासदी अगर भी गजरौला को नहीं जगा सकी, तो यह चूक आने वाली पीढ़ियों को भारी कीमत चुकाने पर मजबूर कर देगी।
