दिल्ली दंगों के आरोप में जेल में पिछले 5 सालों से बंद छात्र एक्टिविस्ट उमर खालिद और शरजील इमाम को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है. हाईकोर्ट के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने भी याचिका को खारिज कर दिया है. हालांकि अन्य 5 आरोपियों को जमानत दे दी है.
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम के खिलाफ प्रथम दृष्टया (prima facie) UAPA की धारा 43D(5) के तहत आरोप गंभीर प्रतीत होते हैं।
भागीदारी का स्तर: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये दोनों आरोपी साजिश के पदानुक्रम में अन्य आरोपियों की तुलना में “उच्च स्तर” पर हैं।
राष्ट्रीय सुरक्षा: अदालत ने माना कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के विचार, मुकदमे से पहले की लंबी हिरासत के दावों से अधिक महत्वपूर्ण हैं।
ट्रम्प कार्ड नहीं: कोर्ट ने कहा कि UAPA के मामलों में केवल मुकदमे में देरी को “ट्रम्प कार्ड” की तरह इस्तेमाल करके स्वचालित रूप से जमानत नहीं मांगी जा सकती।
पांच अन्य आरोपियों को मिली जमानत
कोर्ट ने सामूहिक दृष्टिकोण अपनाने के बजाय प्रत्येक आरोपी की भूमिका का अलग-अलग मूल्यांकन किया। इसके आधार पर निम्नलिखित पांच आरोपियों को जमानत दी गई है:
गुलफिशा फातिमा
मीरान हैदर
शिफा उर रहमान
मोहम्मद सलीम खान
शादाब अहमद
अभियोजन के तर्क
दिल्ली पुलिस ने जमानत का विरोध करते हुए दलील दी कि:
यह दंगे एक सोची-समझी साजिश थे, जिसका उद्देश्य अमेरिकी राष्ट्रपति की यात्रा के दौरान अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित करना और सरकार को अस्थिर करना था।
उमर खालिद को दंगों के लिए “चक्का जाम” के विचार का संस्थापक और मुख्य साजिशकर्ता बताया गया।
पुलिस ने तकनीकी साक्ष्य और व्हाट्सएप चैट का हवाला देते हुए इसे एक “सुनियोजित प्रयास” बताया।
बचाव पक्ष के तर्क
बचाव पक्ष के वकीलों (कपिल सिब्बल, सिद्धार्थ दवे आदि) ने तर्क दिया कि:
आरोपी पिछले 5 सालों से जेल में हैं और मुकदमे की गति बहुत धीमी है।
लंबी हिरासत अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है।
उमर खालिद दंगे के समय दिल्ली में मौजूद भी नहीं थे।
