अमरोहा। औद्योगिक क्षेत्र गजरौला में प्रदूषण की समस्या लगातार गहराती जा रही है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि दूषित पानी से फैल रही बीमारियों को छुपाया जा रहा है और पिछले वर्षों में हुई मौतों के आंकड़े दबाकर जिम्मेदारों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है। इसी बीच नेशनल हाईवे-09 स्थित नाईपुरा गांव के न्यू स्कालर पब्लिक स्कूल के बच्चों के दूषित पानी पीने से बीमार होने की शिकायत सामने आने से स्थिति और गंभीर हो गई है। स्कूल प्रबंधन से जुड़े एहसान अली ने बच्चों के बीमार होने की पुष्टि करते हुए बताया कि यह समस्या केवल स्कूल तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरा नाईपुरा गांव दूषित जल जनित बीमारियों की चपेट में है। ग्रामीणों का कहना है कि पीने के पानी का रंग पीला है, उसमें बदबू आती है और मजबूरी में वही पानी उपयोग में लाया जा रहा है।
गजरौला में रासायनिक कारखानों से होने वाले प्रदूषण के खिलाफ भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के बैनर तले किसानों का बेमियादी धरना शनिवार को 21वें दिन भी जारी रहा। प्रदूषण से सबसे अधिक प्रभावित नाईपुरा गांव के लोग बड़ी संख्या में धरना स्थल पर पहुंचे और आंदोलन को समर्थन दिया।
भाकियू संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने कहा कि आज़ादी के 75 साल बाद भी सरकार गजरौला क्षेत्र के लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने में असफल रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि स्वच्छ भारत अभियान और हर घर नल से जल योजना के नाम पर पिछले 12 वर्षों में हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए, इसके बावजूद गजरौला के लोगों को बदबूदार और दूषित पानी पीने के लिए मजबूर क्यों होना पड़ रहा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन और संबंधित तंत्र आंकड़ों की बाजीगरी में जुटा है। दूषित पानी से होने वाली बीमारियों की वास्तविक संख्या छिपाई जा रही है और पिछले वर्षों में हुई मौतों को दर्ज ही नहीं किया जा रहा। बीमारी को हल्का बताकर कभी मिलावटी खान-पान को जिम्मेदार ठहराया जाता है, ताकि प्रदूषण फैलाने वाले कारखानों पर कार्रवाई से बचा जा सके।वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. गौतम लंबरदार ने बताया कि प्रदूषण के महीन कणों और दूषित जल के प्रभाव से महिलाओं में कमजोरी बढ़ रही है, जिसके चलते कमजोर बच्चों का जन्म हो रहा है। यह स्थिति आने वाली पीढ़ियों के लिए भी गंभीर खतरे का संकेत है।
प्रमुख सचिव अरुण सिद्धू ने कहा कि विकास के नाम पर प्रदूषण की अनदेखी करना बेहद चिंताजनक है। किसानों द्वारा लगातार शिकायत की जा रही है कि नाईपुरा, बसैली, शहबाजपुर डोर, रसूलपुर गोसाईं, फाजलपुर और तिगरिया भूड़ जैसे इलाकों में प्रदूषण से न केवल स्वास्थ्य बल्कि फसलों को भी भारी नुकसान हो रहा है। उन्होंने इसे अव्यवस्था का परिणाम बताया।
भाकियू के प्रदेशाध्यक्ष रामकृष्ण चौहान ने आरोप लगाया कि एक ओर स्थानीय लोगों की आमदनी लगातार घट रही है, वहीं कुछ रासायनिक कारखानों के प्रबंधन और जनसंपर्क तंत्र की संपत्ति में तेजी से इजाफा हो रहा है। उन्होंने मांग की कि इस पूरे मामले की जांच ईडी जैसी एजेंसियों से कराई जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि विकास का लाभ किसे मिल रहा है और उसकी कीमत क्षेत्र के ग्रामीण क्यों चुका रहे हैं।
किसान नेताओं ने बताया कि गजरौला में प्रदूषण की समस्या नई नहीं है। पूर्व में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और एनजीटी द्वारा भी कार्रवाई के आदेश दिए जा चुके हैं। हाल के वर्षों में बैस्ट क्राप (पूर्व में कैमचूरा) फैक्ट्री से गैस रिसाव की घटनाएं सामने आई थीं, जिसके बाद जिला प्रशासन ने कारखाना बंद कराया था, हालांकि कुछ समय बाद उसे फिर से चालू कर दिया गया।
धरना दे रहे किसानों और स्थानीय निवासियों ने सरकार से मांग की है कि भूजल प्रदूषण की तत्काल निष्पक्ष जांच कराई जाए, शुद्ध पेयजल की स्थायी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, दोषी कारखानों पर सख्त कार्रवाई कर पर्यावरण क्षतिपूर्ति वसूली जाए और प्रदूषण से किसानों की फसलों को हुए नुकसान की भरपाई की जाए।
किसान संगठनों ने स्पष्ट किया कि जब तक प्रशासन ठोस और प्रभावी कदम नहीं उठाता, तब तक यह धरना और आंदोलन जारी रहेगा। गजरौला का यह संकट न केवल स्थानीय स्वास्थ्य और कृषि पर गंभीर असर डाल रहा है, बल्कि विकास और पर्यावरण संतुलन पर भी बड़े सवाल खड़े कर रहा है।
धरना स्थल पर डूंगर सिंह, मंसूर अली, हैदर चौधरी, आसिफ अली, इरशाद अली, नासिर अली, सुरेश चंद्र, अमित, रामचंद्र सिंह, महावीर सिंह, ओमपाल सिंह, यशवीर सिंह, एहसान अली सहित बड़ी संख्या में किसान और ग्रामीण मौजूद रहे।
