अमरोहा। एक ओर सरकार विकसित भारत के नारे गिना रही है, तो दूसरी ओर गजरौला में ज़हरीले पानी से कराहते गांवों के किसान 22 दिनों से सड़कों पर डटे हुए हैं। रासायनिक कारखानों से निकल रहे दूषित जल से जनस्वास्थ्य और खेती पर मंडराते खतरे को लेकर उठे आंदोलन के सामने सरकार की प्रतिक्रिया फिलहाल जांच समिति तक सिमटी दिखाई दे रही है।
सोमवार को अमरोहा पहुंचे उत्तर प्रदेश के वन, पर्यावरण, जन्तु उद्यान एवं जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री एवं जनपद प्रभारी मंत्री केपी मलिक ने कहा कि जिलाधिकारी द्वारा गठित समिति मामले की जांच कर रही है, रिपोर्ट मिलने के बाद अगला कदम उठाया जाएगा।
धरने पर अन्नदाता, मंच पर सरकार
विकसित भारत जी राम जी कानून को लेकर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद पत्रकारों से बातचीत के दौरान मंत्री को गजरौला की भयावह स्थिति से अवगत कराया गया। बताया गया कि फैक्ट्रियों से निकलने वाला जहरीला पानी अब गांवों की नसों में घुल चुका है। खेतों के ट्यूबवेल और घरों के हैंडपंपों से पीला, बदबूदार पानी निकल रहा है।
भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी के नेतृत्व में किसान लगातार 22वें दिन भी बेमियादी धरने पर डटे हैं। उनका आरोप है कि दूषित पानी के कारण नपुंसकता, लीवर, टायफाइड और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां फैल रही हैं, जबकि खेती और जमीन की उर्वरा शक्ति तेजी से नष्ट हो रही है।

‘विकास’ बनाम ज़िंदगी
ग्रामीणों का कहना है कि जहरीला पानी भूगर्भ में फैल चुका है, जिससे आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी खतरे में है। सवाल उठ रहा है कि जिस विकास की बात सरकार कर रही है, वही विकास गांवों की ज़िंदगी पर भारी क्यों पड़ रहा है?
चुनाव के वक्त किसानों और गरीबों की दुहाई देने वाले जनप्रतिनिधि अब इस मुद्दे पर खामोश हैं। मजबूरन किसान ठंड में तंबू लगाकर सड़कों पर डटे हुए हैं, जबकि प्रशासन की तरफ से अब तक ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।
जांच पर टिका भरोसा, आंदोलन पर टिकी उम्मीद
प्रभारी मंत्री केपी मलिक ने दोहराया कि जिलाधिकारी निधि गुप्ता वत्स द्वारा गठित जांच समिति अपनी रिपोर्ट तैयार कर रही है। रिपोर्ट आने के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी।
उधर आंदोलनरत किसानों का साफ संदेश है कि, जब तक दूषित पानी की निकासी बंद नहीं होगी, दोषी फैक्ट्रियों पर कार्रवाई नहीं होगी और पीड़ितों को न्याय नहीं मिलेगा, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।
गजरौला में अब यह टकराव सिर्फ पानी का नहीं, सरकार बनाम अन्नदाता की निर्णायक लड़ाई बनता जा रहा है।
