बोले नरेश चौधरी, “नाईपुरा को मौत के हवाले किया जा रहा”
अमरोहा। गजरौला क्षेत्र में रासायनिक कारखानों से फैलते जहरीले प्रदूषण के खिलाफ किसानों का आक्रोश थमने का नाम नहीं ले रहा है। भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के नेतृत्व में नाईपुरा गांव में चल रहा धरना मंगलवार को 31वें दिन भी जारी रहा। धरने का नेतृत्व कर रहे भाकियू संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने तीखे शब्दों में कहा कि यदि हालात ऐसे ही बने रहे तो आने वाले समय में नाईपुरा इंसानों के रहने लायक नहीं बचेगा। यहां सिर्फ नेताओं, अफसरों के पसंदीदा गेस्ट हाउस, कारखानों की चिमनियां और कैंसर जैसी बीमारियां ही रह जाएंगी।

किसान नेताओं का आरोप है कि वर्षों से गजरौला के रासायनिक कारखानों से निकलने वाला जहरीला कचरा और रसायन जल, जंगल और जमीन को बर्बाद कर रहा है। नाईपुरा गांव में हालात इतने भयावह हो चुके हैं कि इसे सामूहिक स्वास्थ्य आपातकाल कहा जा सकता है। ग्रामीणों के अनुसार, जहरीली गैसों और धुएं से सांस लेना दूभर हो गया है, जो धीरे-धीरे लोगों को मौत की ओर धकेल रहा है।
धरने में मौजूद ग्रामीणों ने बताया कि गांव के बच्चे लगातार बीमार हो रहे हैं, बुजुर्ग समय से पहले दम तोड़ रहे हैं और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। किसानों का दावा है कि कारखाना प्रबंधन ने पहली बार अप्रत्यक्ष रूप से प्रदूषण की समस्या को स्वीकार किया है और चुपचाप गांवों व खेतों में बोरिंग का काम शुरू कर दिया गया है।

वहीं जिला प्रशासन द्वारा गठित जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट सार्वजनिक करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा है। इस पर किसान नेताओं ने सवाल उठाते हुए कहा कि यह सिर्फ समय खींचने की रणनीति है, ताकि आंदोलन को कमजोर किया जा सके और लोग थककर चुप बैठ जाएं।
धरने को संबोधित करते हुए नरेश चौधरी ने कहा कि यह मामला केवल जल प्रदूषण का नहीं, बल्कि संरक्षण प्राप्त भ्रष्टाचार का गंभीर उदाहरण है। आम जनता की सेहत, सांस और जिंदगी को सौदेबाजी की वस्तु बना दिया गया है। पहले कारखाना मालिक प्रदूषण से इनकार करते रहे, अब सुधार की बात कर रहे हैं। यदि पहले सब ठीक था, तो जनता से वर्षों तक झूठ क्यों बोला गया?

उन्होंने चेतावनी दी कि विशेषज्ञों के अनुसार यदि पीने के पानी में रेडियोएक्टिव तत्व और भारी धातुएं मौजूद रहीं, तो इसके परिणाम बेहद घातक होंगे। नरेश चौधरी ने एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि विश्व बैंक की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक प्रदूषण के कारण हर साल करीब 10 लाख लोगों की असमय मौत होती है, जिनमें उत्तर प्रदेश की स्थिति सबसे चिंताजनक है।
किसान नेता ने आरोप लगाया कि सरकारी तंत्र का रवैया बेहद संवेदनहीन है। पहले लोग बीमार होते हैं, फिर मरते हैं, तब कहीं जाकर कार्रवाई की बात होती है। मुआवजा भी तब घोषित किया जाता है, जब मौतों की संख्या तय सीमा पार कर जाती है।

धरने में मौजूद किसानों का कहना है कि चुनाव के समय नेता हाथ जोड़कर आते हैं, बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन प्रदूषण के सवाल पर उनके फोन और दफ्तर दोनों बंद हो जाते हैं। स्वास्थ्य शिविरों के नाम पर केवल अस्थायी राहत दी जा रही है, जबकि स्थायी और ठोस समाधान अभी दूर नजर आ रहा है।
इस मौके पर भाकियू संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय सचिव चौधरी चंद्रपाल सिंह, तेजपाल सिंह, अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रदेशाध्यक्ष अहसान अली, होमपाल सिंह, ओमप्रकाश, रामप्रसाद, दौलत राम प्रधान, अदनान सैफी, शाने आलम, सुरेश सिंह, मनोहर सिंह, रघुवीर सिंह, कालू सिंह, लक्ष्मण सिंह समेत बड़ी संख्या में किसान और ग्रामीण मौजूद रहे।
