अमरोहा। गजरौला क्षेत्र के नाईपुरा गांव में दूषित पेयजल से उपजे गंभीर जनस्वास्थ्य संकट का मुद्दा बुधवार को कलेक्ट्रेट सभागार में आयोजित किसान दिवस के दौरान पूरी मजबूती के साथ उठाया गया। भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने जिलाधिकारी के समक्ष किसानों की पीड़ा रखते हुए साफ शब्दों में कहा कि नाईपुरा गांव के लोग वर्षों से जहरीला पानी पीने को मजबूर हैं और अब यह मुद्दा प्रशासनिक जवाबदेही की परीक्षा बन चुका है।
नरेश चौधरी ने बताया कि दूषित पानी की समस्या के विरोध में किसान पिछले 32 दिनों से शहबाजपुर डोर में लगातार धरना दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब सच्चाई आंखों के सामने हो तो प्रमाणों की जरूरत नहीं पड़ती। इसी के तहत किसान हैंडपंप से निकले दूषित पानी को बोतलों में भरकर कलेक्ट्रेट लाए और जिलाधिकारी की मेज पर रखकर हालात की भयावहता को प्रत्यक्ष रूप से सामने रखा।

भाकियू अध्यक्ष ने कहा कि किसानों का बेमियादी धरना केवल विरोध नहीं, बल्कि जवाबदेही तय कराने का संघर्ष है। उन्होंने निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग करते हुए कहा कि जांच से ही सच्चाई सामने आएगी और दोषियों की पहचान होगी। साथ ही उन्होंने औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले रासायनिक अपशिष्टों की ऑनलाइन मॉनिटरिंग और सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध कराने की मांग भी उठाई, जिससे व्यवस्था पर आमजन का भरोसा कायम रह सके।
जिलाधिकारी श्रीमती निधि गुप्ता वत्स ने किसानों की बातों को गंभीरता से सुनते हुए भरोसा दिलाया कि जिला प्रशासन जनस्वास्थ्य के प्रति पूरी तरह संवेदनशील है। उन्होंने कहा कि अब तक आई जांच रिपोर्ट से वह स्वयं संतुष्ट नहीं हैं, इसलिए दूषित पानी के नए नमूने लेकर पुनः प्रयोगशाला में जांच कराई जाएगी। डीएम ने स्पष्ट किया कि नेशनल हाईवे-09 स्थित नाईपुरा गांव की शिकायत को लेकर किसी भी स्तर पर लापरवाही नहीं बरती जाएगी और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाएगी।

उल्लेखनीय है कि गजरौला क्षेत्र में औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले अपशिष्टों के कारण लंबे समय से भूजल प्रदूषण की समस्या बनी हुई है। इस मामले में प्रशासन द्वारा पहले ही छह सदस्यीय जांच समिति गठित की जा चुकी है, जो फैक्ट्रियों, हैंडपंपों, ट्यूबवेलों और कॉमन ट्रीटमेंट प्लांट की जांच कर रही है।
किसान संगठनों का कहना है कि जब तक दूषित जल की समस्या का स्थायी समाधान और दोषियों पर कार्रवाई नहीं होती, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा। ग्रामीणों के स्वास्थ्य और खेती को सुरक्षित रखने के लिए वे पारदर्शी और सख्त कदम उठाने की मांग पर अड़े हुए हैं।
