अमरोहा। विश्व कैंसर दिवस के दिन जहां पूरी दुनिया कैंसर से लड़ने का संकल्प ले रही है, वहीं अमरोहा जिले के औद्योगिक कस्बे गजरौला के नाईपुरा इलाके में कैंसर एक मौन महामारी का रूप ले चुका है। यहां का भूमिगत जल इतना अधिक दूषित हो चुका है कि स्थानीय लोग इसे “मौत का पानी” कहने लगे हैं।
स्थानीय निवासियों का आरोप है कि आसपास स्थापित रासायनिक फैक्ट्रियों से निकलने वाला जहरीला अपशिष्ट बिना किसी शोधन के सीधे जमीन के नीचे समा रहा है। इसका नतीजा यह है कि क्षेत्र में कैंसर, श्वसन रोग, त्वचा रोग और अन्य घातक जलजनित बीमारियों में लगातार इज़ाफा हो रहा है। कई परिवारों में एक के बाद एक मौतों की घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जबकि खेती पूरी तरह चौपट हो गई है।
काग़ज़ों तक सिमट गया विश्व कैंसर दिवस
विश्व कैंसर दिवस की शुरुआत वर्ष 2000 में पेरिस चार्टर के तहत कैंसर जागरूकता, बेहतर इलाज और शोध को बढ़ावा देने के उद्देश्य से हुई थी, लेकिन नाईपुरा जैसे इलाकों में यह दिवस सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह गया है। यहां प्रदूषण ने कैंसर को घर-घर पहुंचा दिया है और जिम्मेदार संस्थाएं आंख मूंदे बैठी हैं।
46वें दिन भी जारी बेमियादी धरना
इसी गंभीर मुद्दे को लेकर शहबाजपुर डोर में भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के बैनर तले चल रहा बेमियादी धरना आज 46वें दिन में प्रवेश कर गया। कड़ाके की ठंड, दूषित वातावरण और गंभीर स्वास्थ्य संकट के बावजूद किसान और ग्रामीण लगातार धरने पर डटे हुए हैं।
धरने को संबोधित करते हुए अल्पसंख्यक मोर्चा प्रभारी एवं मंडलाध्यक्ष एहसान अली ने कहा कि,
“नाईपुरा और आसपास के गांवों में दूषित पानी अब मौत का दूसरा नाम बन चुका है। फैक्ट्रियों की मनमानी से पानी, मिट्टी और हवा—तीनों ज़हरीले हो चुके हैं। यह खुला जनसंहार है।”
ईटीपी के बिना चल रहीं फैक्ट्रियां, प्रशासन मौन
किसान नेताओं ने आरोप लगाया कि औद्योगिक इकाइयां बिना प्रभावी ईटीपी (एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट) के जहरीला अपशिष्ट बहा रही हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, जिला प्रशासन और सरकार पर गंभीर लापरवाही के आरोप लगाते हुए किसानों ने मांग की कि-
- सभी फैक्ट्रियों में प्रभावी ईटीपी तत्काल लगाए जाएं
- भूमिगत जल की नियमित और पारदर्शी जांच हो
- कैंसर व अन्य बीमारियों से पीड़ित परिवारों को मुआवजा दिया जाए
बड़े हादसे की चेतावनी
धरने पर मौजूद किसानों ने साफ चेतावनी दी है कि यदि मांगों को नजरअंदाज किया गया तो आंदोलन को और उग्र किया जाएगा। किसानों का कहना है कि प्रशासन की उदासीनता ने हालात को इतना गंभीर बना दिया है कि यह क्षेत्र इंदौर जैसे बड़े औद्योगिक-पर्यावरणीय हादसे की ओर बढ़ सकता है।
धरने में बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल
धरने में नूरजहाँ, कृष्ण देव, रामप्रसाद सैनी, ओमप्रकाश, होमपाल सिंह, गंगाराम, विजय सिंह, अंकित कुमार, अशद अली, सीसपाल सैनी, अदनान अली, अरुण कुमार सहित बड़ी संख्या में महिला-पुरुष किसान मौजूद रहे।
विश्व कैंसर दिवस पर यह धरना केवल एक आंदोलन नहीं, बल्कि प्रदूषण के खिलाफ जीवन बचाने की जंग और सिस्टम को जगाने की आख़िरी चेतावनी बन गया है।
