अमरोहा। गजरौला के नाईपुरा इलाके में कैमिकल कारखानों की जहरीली मनमानी छूट को किसानों ने सामूहिक आत्मघात करार दिया। आक्रोशित किसानों ने रविवार को जुबिलेंट इन्ग्रेविया फैक्ट्री का पुतला जलाकर विरोध प्रदर्शन किया।
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले में गजरौला क्षेत्र में जुबिलेंट इन्ग्रेविया सहित रासायनिक कारखानों से निकलने वाले जहरीले अपशिष्ट और प्रदूषण ने स्थानीय किसानों व निवासियों के लिए गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। नाईपुरा इलाके में भूजल का 90 प्रतिशत हिस्सा दूषित हो चुका है, जिससे पेयजल की गुणवत्ता तेजी से गिर रही है। बगद नदी, जो कभी कल-कल बहती थी, अब जहरीले नाले में बदल गई है। इससे कृषि, जैवविविधता और लोगों के स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ रहा है।

भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के बैनर तले शहबाजपुर डोर में किसानों का बेमियादी धरना 15 फरवरी को 57वें दिन भी जारी रहा। प्रमुख सचिव अरुण सिद्धू समेत तमाम किसान कारखानों द्वारा बिना उचित शोधन के अपशिष्ट नदी और जलस्रोतों में छोड़ने तथा पारंपरिक जलस्रोतों के अत्यधिक दोहन का आरोप लगा रहे हैं।

भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने इसे सामूहिक आत्मघात करार दिया। उन्होंने कहा कि प्रदूषित जल से फसलें बर्बाद हो रही हैं, पशु प्रभावित हैं और स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ रही हैं। प्रमुख सचिव अरुण सिद्धू तथा अल्पसंख्यक मोर्चा प्रभारी एहसान अली ने चेतावनी दी कि कारखानों से निकलने वाली कैमिकल युक्त तपीश से बसंत का सुकून गायब हो रहा है। फरवरी में ही असामान्य गर्मी और हीटवेव का खतरा बढ़ गया है, जो “हीट आइलैंड इफेक्ट” को और तेज कर रहा है।
किसान नेता प्रशासन पर कारखानों के साथ मिलीभगत का आरोप लगा रहे हैं। जल प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम 1974 और अपशिष्ट प्रबंधन नियमों को नजरअंदाज करने का दावा किया जा रहा है। भारत की स्वच्छ जल रैंकिंग में 2025 में 172 देशों में 138वां स्थान होने का हवाला देते हुए उन्होंने मांग की है कि प्रदूषण रोकने के लिए तत्काल कार्रवाई हो, अन्यथा आने वाले वर्षों में बसंत सिर्फ यादों में रह जाएगा। हालांकि प्रशासन ने हाल में प्रदूषण पर कुछ कार्रवाई शुरू की है, लेकिन किसान लंबे समय तक सुरक्षा और समाधान की मांग पर अड़े हैं। किसान नेताओं का कहना है कि जब सत्ता, पूंजी और चुप्पी एक साथ टेबल पर बैठ जाएं तो नियम फाइलों में दबे रहते हैं और मुनाफा चुनिंदा जेबों में चला जाता है। पारदर्शिता की जगह प्रक्रिया का जाल, जवाबदेही की जगह रटा-रटाया जवाब, सब नियमों के तहत हो रहा है, ने हालात बेकाबू कर दिए हैं।परिणामस्वरूप नाईपुरा-शहबाजपुर डोर आंदोलन आर्थिक विकास के दावों के पीछे छिपी पर्यावरणीय तबाही को उजागर कर रहा है।

धरना प्रदर्शन के दौरान होमपाल सिंह, गंगाराम सिंह, होमपाल सैनी, हाजी नन्नु सैफी, रामप्रसाद सिंह, समरपाल सैनी, जाबिर अली, राजपाल सैनी, योगेश सैनी, भूखन सिंह, ओमप्रकाश सिंह, सतीराम सिंह, दिनेश सिंह, भूपसिंह सैनी, सुदेश सिंह, सोमपाल सिंह, अशोक कुमार, रामशरण सिंह, शीशपाल सिंह,असद अली, अदनान चौधरी, हेम सिंह, साज़िद चौधरी, कर्मवीर भगत जी, अखिल चौधरी, चमन सिंह, पदम सिंह, रिंकू सिंह, इन्द्रपाल सिंह, राकेश सिंह, चेतराम सिंह समेत सैकड़ों किसानों ने विरोध प्रदर्शन में भाग लिया।
