अमरोहा। जिले के गजरौला औद्योगिक क्षेत्र से सटे नाईपुरा गांव में भूजल प्रदूषण की समस्या अब जीवन-मरण का सवाल बन चुकी है। रासायनिक कारखानों से निकलने वाले जहरीले अपशिष्ट ने भूजल को बुरी तरह दूषित कर दिया है। हैंडपंप और बोरिंग से निकलने वाला पानी पीला, बदबूदार और केमिकल युक्त हो गया है, जिससे स्थानीय निवासियों में त्वचा रोग, पेट की बीमारियां, दमा और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां फैल रही हैं। फसलें बर्बाद हो रही हैं, पशुधन प्रभावित है और ग्रामीणों की रोजमर्रा की जिंदगी संकट में पड़ गई है।

शहबाजपुर डोर में भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के बैनर तले किसान पिछले 59 दिनों से अधिक अनिश्चितकालीन धरने पर डटे हुए हैं। वे प्रदूषण फैलाने वाली फैक्ट्रियों पर सख्त कार्रवाई, पीड़ितों को उचित मुआवजा, शुद्ध पेयजल की स्थायी व्यवस्था और पर्यावरण संरक्षण की मांग कर रहे हैं। किसानों का आरोप है कि गजरौला क्षेत्र की रासायनिक इकाइयों का अपशिष्ट बगद नदी, तालाबों और भूजल में सीधे मिल रहा है, जिससे न केवल नाईपुरा बल्कि आसपास के 30-40 गांव प्रभावित हैं।
भाकियू संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने कहा कि योगी आदित्यनाथ दिल्ली की हवा को जहरीला बताकर राजनीतिक संदेश दे रहे हैं, लेकिन उनके प्रदेश में नाईपुरा जैसे इलाकों में जल-जमीन-हवा की नैसर्गिकता खत्म हो चुकी है। गौरतलब है कि सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने हालिया बयान में दिल्ली की हवा को ज़हरीला बताया था। उन्होंने यह जोखिम लिया क्योंकि उन्हें पता है कि जब वे दिल्ली की हवा को ज़हरीला बताएंगे तो उनके अपने प्रदेश के अमरोहा जिले के गजरौला इलाके के करीब 40 गांवों के आंकड़े भी सार्वजनिक करने पड़ेंगे।

किसान नेता नरेश चौधरी ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि धरने के शुरुआती दिनों में किसानों की मांग पर संवेदनशीलता दिखाते हुए जिलाधिकारी श्रीमती निधि गुप्ता वत्स द्वारा छह सदस्यीय जांच समिति गठित की थी, समिति द्वारा यहां के प्रभावित गांवों के भूमिगत पानी और मिट्टी के नमूने लिए थे, और किसानों को आश्वासन दिया था रिपोर्ट एक माह के अंतराल में सार्वजनिक कर दी जाएगी।लेकिन जांच रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक नहीं किया जाना संदेहास्पद है। आरोप है कि रिपोर्ट दबाकर रखी गई है। चौधरी ने सवाल किया कि “रिपोर्ट में आखिर ऐसा क्या है जिसे प्रशासन को छिपाना पड़ रहा है? क्या सच सामने आने से बड़े औद्योगिक हित प्रभावित होंगे?” अथवा स्थानीय लोगों के कैंसर जैसी ख़तरनाक बीमारियों की चपेट में आने के दावों की रिपोर्ट में पुष्टि हुई है?

अल्पसंख्यक मोर्चा प्रभारी एवं मंडलाध्यक्ष एहसान अली ने प्रदूषण की गंभीरता पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि नाईपुरा और आसपास के इलाकों में जहरीला पानी अब जानलेवा बन चुका है। बड़े नेता और मंत्री इस जन स्वास्थ्य संकट पर चुप्पी साधे हुए हैं। एहसान अली ने मांग की कि फैक्ट्रियों में ईटीपी (एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट) अनिवार्य रूप से लगाए जाएं और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सख्त निगरानी करे।

किसान नेताओं का कहना है कि इंदौर जैसी घटना यहां भी हो सकती है, जहां दूषित पानी से मौतें हुईं। प्रशासन की लापरवाही और चुप्पी से आक्रोश बढ़ रहा है। किसान बोले, “मरना मंजूर, लेकिन झुकना नहीं।” यह आंदोलन अब केवल स्थानीय मुद्दा नहीं रहा, बल्कि औद्योगिक विकास और पर्यावरण-किसान न्याय के बीच टकराव का प्रतीक बन चुका है। यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो आंदोलन और तेज हो सकता है।

इस अवसर पर मुख्य रूप से आजम चौधरी, हांजी नन्नू सैफी, होमपाल सिंह, समर पाल सैनी, ओम प्रकाश सिंह, शमशाद चौधरी, सोमपाल सिंह, राकेश सैनी, रामप्रसाद सिंह,बाबू अली, गंगाराम सिंह, सौरभ कुमार, पृथ्वी सिंह, मंसूर अली, दिनेश सैनी, विनोद कुमार, लव कुश सागर, अयान सैफी, जुबेर सैफी, राहुल कुमार समेत ज़हरीले रासायनिक उत्सर्जन से प्रभावित इलाकों के किसान मौजूद थे।
