सुप्रीम कोर्ट ने 19 फरवरी, 2026 को “मुफ्त की रेवड़ियों” (freebies) पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि देश के अधिकांश राज्य राजस्व घाटे (revenue deficit) में चल रहे हैं, फिर भी वे विकास को नजरअंदाज कर बड़े पैमाने पर मुफ्त सुविधाएं बांट रहे हैं।
राज्यों की वित्तीय स्थिति: चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मौखिक टिप्पणी की कि देश के लगभग सभी राज्य घाटे में हैं। कोर्ट ने सवाल किया, “आप जो राजस्व एकत्र करते हैं, उसका 25% हिस्सा राज्य के विकास के लिए क्यों नहीं इस्तेमाल किया जा सकता?”
कार्य संस्कृति पर प्रभाव: कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि सुबह से शाम तक मुफ्त भोजन, साइकिल और बिजली दी जाएगी, तो लोग काम क्यों करेंगे? इससे देश की कार्य संस्कृति (work culture) प्रभावित हो रही है और यह विकास में बाधक है।
चुनाव पूर्व ‘तुष्टीकरण’: पीठ ने चुनाव से ठीक पहले घोषित की जाने वाली नकद हस्तांतरण योजनाओं को “तुष्टीकरण” (appeasement) करार दिया। कोर्ट ने कहा कि जो लोग खर्च वहन कर सकते हैं और जो नहीं, उनके बीच अंतर किए बिना लाभ बांटना गलत है।
तमिलनाडु मामले में सख्ती: यह टिप्पणियां Tamil Nadu Power Distribution Corporation Ltd की उस याचिका पर सुनवाई के दौरान आईं, जिसमें मुफ्त बिजली देने के प्रस्ताव पर सवाल उठाए गए थे. कोर्ट ने पूछा कि जब बिजली टैरिफ अधिसूचित हो चुका था, तो अचानक मुफ्त बिजली की घोषणा क्यों की गई।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह कल्याणकारी योजनाओं (welfare schemes) के खिलाफ नहीं है, लेकिन बिना किसी वित्तीय आधार के बांटी जाने वाली “रेवड़ियों” और विकास कार्यों की अनदेखी पर उसे गंभीर आपत्ति है।
