अमरोहा। वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार मधूसुदन आनंद के निधन पर अमरोहा के साहित्य एवं पत्रकारिता जगत में गहरा शोक छाया हुआ है। पत्रकारों शोक संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि मधूसुदन आनंद हिंदी पत्रकारिता के एक ऐसे स्तंभ थे, जिन्होंने न केवल खबरों को सच्चाई और गरिमा दी, बल्कि साहित्य की दुनिया को भी नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं।उनका चले जाना न केवल हिंदी साहित्य का एक अध्याय अधूरा रह गया बल्कि हिंदी पत्रकारिता का एक युग बीत गया।
वरिष्ठ पत्रकार, नवभारत टाइम्स दिल्ली के पूर्व संपादक और प्रतिष्ठित साहित्यकार मधूसूदन आनंद के निधन पर अमरोहा प्रेस क्लब, मंडी धनौरा प्रेस क्लब, विश्व हिंदी मंच और क्षेत्र के अनेक पत्रकारों-साहित्यकारों ने शोक सभा में उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। इस सभा में उपस्थित हर आँख नम थी और हर दिल में उनके प्रति गहरा सम्मान और अपनापन झलक रहा था।
दिवंगत मधूसुदन आनंद का 18 फरवरी की देर शाम दिल्ली के एक निजी अस्पताल में 73 वर्ष की आयु में निधन हो गया। पिछले कुछ समय से वे अस्वस्थ थे, लेकिन उनकी विदाई ने हिंदी जगत को एक ऐसा शून्य दे दिया है, जिसकी भरपाई आसान नहीं। 20 दिसंबर 1952 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के नजीबाबाद में जन्मे मधूसुदन आनंद ने 1974 में नवभारत टाइम्स में ट्रेनी पत्रकार के रूप में अपना सफर शुरू किया और 2009 तक विभिन्न वरिष्ठ पदों खासकर एक्जीक्यूटिव एडिटर पर रहते हुए हिंदी पत्रकारिता को नई दिशा दी।
उनके समय में नवभारत टाइम्स पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विश्वसनीयता का पर्याय बन गया था। लोग सुबह-सवेरे अखबार का इंतजार करते थे, क्योंकि उसमें खबरें सिर्फ सूचना नहीं, बल्कि जनसरोकार से जुड़ी सच्चाई होती थी। मधूसुदन आनंद के दिशा-निर्देशन में शुरू हुआ “ताकि शहर चले गांव की ओर” कॉलम मंडी धनौरा डेटलाइन से प्रकाशित होता था और ग्रामीण पाठकों के बीच बेहद लोकप्रिय रहा। अमरोहा और आसपास के इलाकों के पत्रकारों से उनका विशेष लगाव था वे आंचलिक पत्रकारिता के आदर्श मार्गदर्शक, प्रेरणा स्रोत और बड़े भाई की तरह थे।
शोक सभा में डॉ. महताब अमरोहवी, महिपाल सिंह, डॉ शाकिर अमरोहवी, तुलाराम ठाकुर, बीएस आर्य, डॉ तारिक अज़ीम, मोमीन कुरैशी , सैय्यद जमशेद , परवेज सहारा, जितेन्द्र शर्मा, धर्मेंद्र सैनी, सचिन बिश्नोई सहित तमाम साहित्यकारों एवं वरिष्ठ पत्रकारों ने एक स्वर में कहा, “यह सिर्फ एक व्यक्ति का जाना नहीं, हिंदी पत्रकारिता और हिंदी साहित्य की अपूर्णीय क्षति है।” मधूसुदन आनंद ने पत्रकारिता के उच्च मानकों के साथ कभी समझौता नहीं करने दिया। उनकी लेखनी में साहित्यिक गहराई और पत्रकारिता की निष्पक्षता का अनोखा संगम था।
उल्लेखनीय है कि उन्होंने ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित प्रतिष्ठित पत्रिका नया ज्ञानोदय का संपादन बिना किसी शुल्क के किया, जो उनके साहित्य प्रेम और निस्वार्थ योगदान को दर्शाता है। हिंदी साहित्य में उनकी रचनाएँ और संपादकीय कार्य आज भी प्रेरणा देते हैं।
अमरोहा के पत्रकारों ने कहा, मधूसुदन आनंद अमरोहा के पत्रकारों से गहरा लगाव था। उनके आदर्श हमें सिखाते हैं कि पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं, एक जिम्मेदारी और भावना है।आज जब हम उनकी याद में सिर झुकाते हैं, तो दिल से यही प्रार्थना निकलती है उनकी आत्मा को शांति मिले और उनकी विरासत हमें हमेशा उच्च आदर्शों की ओर ले जाती रहे।
