मुरादाबाद। महिलाओं के सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता की दिशा में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) की योजनाएं ग्रामीण क्षेत्रों में नई उम्मीद जगा रही हैं। मुरादाबाद जिले की ठाकुरद्वारा तहसील के रतुपुरा गांव की रहने वाली शालिनी इसी बदलाव की एक प्रेरक मिसाल बनकर उभरी हैं। कभी गोबर से उत्पाद बनाने को लेकर लोगों के ताने सुनने वाली शालिनी आज जूट और गोमय उत्पादों के माध्यम से न सिर्फ अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर चुकी हैं, बल्कि गांव की दर्जनों महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनने का रास्ता दिखा रही हैं।
एनआरएलएम से मिली नई दिशा
शालिनी के आत्मनिर्भर बनने की शुरुआत वर्ष 2021 में हुई, जब वह राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत कार्य कर रही आईसीआरपी टीम के संपर्क में आईं। उन्होंने गांव की 10 महिलाओं को साथ लेकर ‘अंशिका स्वयं सहायता समूह’ का गठन किया।
समूह को योजना के तहत शुरुआत में ₹2,500 का स्टार्टअप फंड और ₹15,000 का रिवॉल्विंग फंड प्राप्त हुआ। इसके बाद जनवरी 2022 में उन्हें ₹1,10,000 का कम्युनिटी इन्वेस्टमेंट फंड (CIF) मिला, जो वर्तमान में बढ़कर ₹1,50,000 तक पहुंच चुका है।
बैंक लिंकेज के माध्यम से समूह को ₹50,000 की कैश क्रेडिट लिमिट (CCL) से शुरुआत मिली, जो अब बढ़कर ₹2,00,000 हो गई है। इसी आर्थिक सहयोग ने शालिनी के छोटे से प्रयास को एक मजबूत व्यवसाय में बदलने में अहम भूमिका निभाई।
जूट और गोमय उत्पादों से बनाई पहचान
शालिनी पर्यावरण के अनुकूल जूट और गोमय (गोबर) से विभिन्न उत्पाद तैयार करती हैं। नाबार्ड की ओर से गांव में आयोजित 15 दिवसीय प्रशिक्षण के बाद उन्होंने जूट के लंच बैग, बोतल बैग, शॉपिंग बैग और हैंडी बैग बनाना शुरू किया।
इसके साथ ही काशीपुर से निजी प्रशिक्षण लेकर उन्होंने गोमय उत्पादों का निर्माण भी शुरू किया।
उनके बनाए उत्पादों में समरानी कप, सजावटी दीये, गोबर से बनी घड़ियां, मोमेंटो और नेम प्लेट शामिल हैं। इसके अलावा आरसेटी (RSETI) के माध्यम से उन्होंने आर्टिफिशियल ज्वेलरी और अगरबत्ती बनाने का प्रशिक्षण भी लिया है, जिससे उनके उत्पादों की विविधता और बढ़ गई है।
मेलों और प्रदर्शनियों से मिला बड़ा बाजार
सरकारी मेलों और प्रदर्शनियों ने शालिनी के उत्पादों को पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मुरादाबाद के सरस मेले और उदीषा महोत्सव 2026 जैसे आयोजनों में उनके स्टॉल लगाए जाते हैं।
इसके अलावा विकास भवन में होने वाली बैठकों के लिए जूट के फाइल फोल्डर की आपूर्ति भी उनके समूह द्वारा की जाती है।
आज शालिनी जूट उत्पादों से प्रतिमाह लगभग ₹8,000 से ₹15,000 तक की आय अर्जित कर रही हैं, जबकि गोमय उत्पादों से ₹7,000 से ₹10,000 तक की कमाई हो जाती है। त्योहारी सीजन, विशेषकर दिवाली के समय उनकी मासिक आय ₹25,000 से ₹26,000 तक पहुंच जाती है। इस प्रकार उनकी सालाना आय में लगभग ₹1.5 लाख का इजाफा हुआ है।
तानों के बीच भी नहीं छोड़ा हौसला
शालिनी बताती हैं कि जब उन्होंने गोबर से उत्पाद बनाने का काम शुरू किया, तो गांव के कई लोगों ने उनका मजाक उड़ाया और ताने दिए कि “गोबर से भला क्या होगा?”।
लेकिन पति के सहयोग और अपनी मजबूत इच्छाशक्ति के दम पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और लगातार मेहनत करती रहीं।
आज स्थिति यह है कि वही लोग उनकी सफलता की सराहना कर रहे हैं। रतुपुरा गांव में अब कई स्वयं सहायता समूह सक्रिय हो चुके हैं और शालिनी अब तक 30 से अधिक महिलाओं को प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा दे चुकी हैं।
ग्रामीण महिलाओं के लिए बनी प्रेरणा
शालिनी की कहानी इस बात का प्रमाण है कि यदि सरकारी योजनाओं का सही दिशा में लाभ उठाया जाए, तो ग्रामीण महिलाएं भी आत्मनिर्भरता की नई मिसाल कायम कर सकती हैं। उन्होंने अपने संघर्ष और मेहनत से न केवल अपनी जिंदगी बदली, बल्कि अपने गांव की कई महिलाओं के जीवन में भी आत्मविश्वास और रोजगार की नई रोशनी जलाई है।
