मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बना दिया है। संभावित एनर्जी संकट की आशंका के चलते कच्चे तेल और गैस की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल रहा है। इसका असर दुनियाभर की करेंसी पर पड़ा है और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कई मुद्राएं कमजोर हो रही हैं, जिनमें भारतीय रुपया भी शामिल है।
गुरुवार को ब्रेंट क्रूड ऑयल करीब 119 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जिसके बाद रुपये में बड़ी गिरावट दर्ज की गई। डॉलर के मुकाबले रुपया लगभग 0.65% गिरकर 93.24 तक पहुंच गया, जो इससे पहले के 92.63 के रिकॉर्ड निचले स्तर से भी नीचे है। यह पहली बार है जब रुपया 93 के पार गया है। अमेरिका-ईरान तनाव के बाद से अब तक भारतीय मुद्रा करीब 2% तक कमजोर हो चुकी है।
रुपये की कमजोरी का सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ेगा। विदेश से आने वाले सामान महंगे हो जाएंगे, जिससे इलेक्ट्रॉनिक्स, पेट्रोलियम उत्पाद, सोना-चांदी और इम्पोर्टेड गाड़ियां खरीदना और महंगा हो सकता है। साथ ही विदेश में पढ़ाई और यात्रा का खर्च भी बढ़ेगा।
हालांकि, इसका एक सकारात्मक पक्ष भी है। रुपये के कमजोर होने से भारतीय निर्यात को फायदा मिलता है। आईटी सेवाएं, दवाइयां, बासमती चावल और अन्य निर्यातित सामान वैश्विक बाजार में सस्ते हो जाते हैं, जिससे उनकी मांग बढ़ सकती है। इसके अलावा, विदेश से भारत आने वाला पैसा (रेमिटेंस) ज्यादा मूल्य का हो जाता है और विदेशी पर्यटकों के लिए भारत घूमना सस्ता पड़ता है।
वहीं, आयात महंगा होने के कारण देश में महंगाई बढ़ने का खतरा भी बढ़ जाता है, खासकर तेल और गैस जैसी जरूरी चीजों में। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वैश्विक हालात लंबे समय तक ऐसे ही बने रहे और कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं, तो आने वाले समय में रुपया और गिरकर 95 के स्तर तक पहुंच सकता है।
डॉलर की मजबूती और रुपये की गिरावट का असर देश की आर्थिक विकास दर पर भी पड़ सकता है। महंगाई बढ़ने के साथ-साथ लोन की ब्याज दरों में भी इजाफा होने की संभावना जताई जा रही है।
