सरकारी नौकरी, दिल्ली में मेडिकल स्टोर और झूठा शपथ पत्र, मैनपुरी के फार्मासिस्ट पर बड़े खुलासे
मैनपुरी में फार्मसिस्ट पर फर्जीवाड़े के गंभीर आरोप, जांच में शिकायत सही मिलने के बाद भी कार्रवाई का इंतजार
मैनपुरी। जनपद मैनपुरी के दन्नाहार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर तैनात एक फार्मसिस्ट पर सरकारी सेवा के दौरान नियमों के विपरीत दिल्ली में मेडिकल स्टोर संचालित करने और भ्रामक जानकारी देने के गंभीर आरोप लगे हैं। शिकायतों और विभागीय जांच में आरोपों की पुष्टि होने के बावजूद अब तक कोई बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई न होने से स्वास्थ्य विभाग और शासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं।
आरोप है कि फार्मसिस्ट प्रदीप दीक्षित ने सरकारी सेवा में रहते हुए वर्ष 2016 में दिल्ली फार्मेसी काउंसिल में पंजीकरण कराया और दक्षिणी दिल्ली के कालकाजी क्षेत्र में “राज केमिस्ट” नाम से मेडिकल स्टोर का संचालन करवाया। शिकायतकर्ता पक्ष का दावा है कि यह मेडिकल स्टोर करीब सात वर्षों तक संचालित होता रहा।

2023 में हुई शिकायत, 2025 में जांच में मिली पुष्टि

मामले को सबसे पहले वर्ष 2023 में भारतीय किसान मजदूर यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट ओमवीर सिंह ने जनसुनवाई पोर्टल पर उठाया था। आरोप है कि शुरुआती स्तर पर शिकायत को दबाने की कोशिश की गई, लेकिन लगातार फॉलोअप और शिकायतों के बाद स्वास्थ्य विभाग को विस्तृत जांच करानी पड़ी।
बताया जा रहा है कि वर्ष 2025 में हुई विभागीय जांच में अपर निदेशक स्वास्थ्य, आगरा मंडल ने शिकायत को सही पाया। जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी फार्मसिस्ट द्वारा अपने बचाव में प्रस्तुत किए गए शपथ पत्र और दस्तावेजों में कई तथ्य भ्रामक और असत्य पाए गए। सूत्रों के मुताबिक जांच रिपोर्ट दिसंबर 2025 में शासन को भेजी जा चुकी है।
ड्रग कंट्रोल विभाग से हटाया गया नाम

शिकायतकर्ता का दावा है कि शिकायत के बाद वर्ष 2023 में ड्रग कंट्रोल विभाग की सूची से संबंधित मेडिकल स्टोर और नाम को हटाया गया। हालांकि, इसके बावजूद अब तक न तो विभागीय दंडात्मक कार्रवाई हुई और न ही आरोपी का तबादला किया गया।
ट्रांसफर पॉलिसी पर भी उठे सवाल
मामले में एक बड़ा सवाल ट्रांसफर पॉलिसी को लेकर भी खड़ा हो रहा है। प्रदेश सरकार की वर्ष 2026 की स्थानांतरण नीति में समूह ‘ग’ कर्मचारियों के लिए एक ही मंडल या जिले में अधिकतम तीन वर्ष की अवधि तय की गई है। इसके बावजूद आरोपित फार्मसिस्ट आठ वर्षों से अधिक समय से आगरा मंडल और गृह जनपद मैनपुरी में तैनात बताए जा रहे हैं।
शिकायतकर्ता पक्ष का आरोप है कि उच्च अधिकारी भी कार्रवाई और तबादले के मामले में निर्णय लेने से बच रहे हैं। इससे शासन की “जीरो टॉलरेंस” नीति की प्रभावशीलता पर भी प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।
कार्रवाई हुई तो हो सकती हैं कई धाराएं
जानकारों के अनुसार यदि जांच रिपोर्ट के आधार पर शासन कठोर कार्रवाई करता है तो आरोपी पर विभागीय वसूली, निलंबन, सेवा से बर्खास्तगी और धोखाधड़ी जैसी धाराओं में मुकदमा दर्ज होने तक की कार्रवाई संभव है।
शिकायतकर्ता बोला : अभी भी न्याय की उम्मीद
शिकायतकर्ता एडवोकेट ओमवीर सिंह का कहना है कि उन्हें अब भी सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति और शासन पर भरोसा है। उनका कहना है कि यदि निष्पक्ष कार्रवाई होती है तो यह मामला स्वास्थ्य विभाग में लंबे समय से चल रही अनियमितताओं के खिलाफ बड़ा उदाहरण बन सकता है।
