अमरोहा। लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, बल्कि जनता तक पहुंचने वाले सच से चलता है, जिसे पहुंचाने का काम मीडिया यानी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ करता है। हालांकि, वर्तमान समय में इस स्तंभ की सुरक्षा और विश्वसनीयता दोनों ही दांव पर लगी हैं। देश के विभिन्न हिस्सों, विशेषकर ग्रामीण व कस्बाई क्षेत्रों से पत्रकारों को धमकियां मिलने, उन पर हमले होने और झूठे मुकदमों में फंसाए जाने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। सीमित संसाधनों के बीच जनहित की पत्रकारिता करने वाले इन जमीनी पत्रकारों को न तो बड़े संस्थानों का संरक्षण प्राप्त है और न ही कानूनी सुरक्षा। इसलिए, डॉक्टरों की तर्ज पर पत्रकारों पर होने वाले हमलों को भी विशेष श्रेणी का गंभीर अपराध घोषित करते हुए तत्काल ‘पत्रकार सुरक्षा कानून’ लागू करने की आवश्यकता है।
इस कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए प्रत्येक जिले में पुलिस, प्रशासन और विधिक अधिकारियों के समन्वय से एक ‘पत्रकार सुरक्षा सेल’ का गठन किया जाना चाहिए। जिला स्तर पर नियुक्त नोडल अधिकारी पत्रकारों को आपातकालीन सुरक्षा, विधिक सहायता और प्रशासनिक मार्गदर्शन उपलब्ध कराने के लिए जवाबदेह हो। इसके साथ ही, पत्रकारों के उत्पीड़न, फर्जी मुकदमों और पेशेवर विवादों की निष्पक्ष जांच व समाधान के लिए देश में एक स्वतंत्र ‘पत्रकार आयोग’ की स्थापना समय की मुख्य मांग बन चुकी है।
एक तरफ जहां वास्तविक पत्रकार सुरक्षा के अभाव से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ विज्ञापन आधारित फर्जी पत्रकारिता का जाल तेजी से पैर पसार रहा है। यूपी वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के सेक्रेटरी डॉ संतोष गुप्ता ने कहा है कि पत्रकारिता की आड़ में ब्लैकमेलिंग और निजी हितों का कारोबार चलाने वाले इन तत्वों के कारण ईमानदार पत्रकारों की साख प्रभावित हो रही है। इस पर अंकुश लगाने के लिए डिजिटल मीडिया का पंजीकरण अनिवार्य करते हुए जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
पत्रकारिता की गुणवत्ता और नैतिक मानकों को बनाए रखने के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता व पेशेवर प्रशिक्षण को अनिवार्य किया जाना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त, फर्जीवाड़े को रोकने के लिए एक समान और प्रमाणित ‘राष्ट्रीय पत्रकार पहचान पत्र’ की व्यवस्था लागू की जानी चाहिए। यदि लोकतंत्र को अक्षुण्ण रखना है, तो पत्रकारिता को सुरक्षित, स्वतंत्र और जवाबदेह बनाने के लिए अब चर्चाओं से आगे बढ़कर ठोस विधायी निर्णय लेने का समय आ गया है/INN
