मुरादाबाद। देश की परीक्षा प्रणाली और उसके समानांतर खड़े कोचिंग उद्योग का संकट अब सिर्फ प्रशासनिक विफलता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह छात्र जीवन के लिए एक गंभीर मानवीय और बौद्धिक त्रासदी बन चुका है। हाल ही में लखनऊ के अलीगंज स्थित एक कोचिंग संस्थान के बेसमेंट में लगी भीषण आग और देश भर में अनवरत जारी पेपर लीक की घटनाओं ने इस पूरी व्यवस्था की खोखली बुनियाद को उजागर कर दिया है। यह स्थिति नियमों की अनदेखी, सुरक्षा मानकों से समझौते और नीतिगत प्राथमिकताओं में गंभीर कमियों का सीधा परिणाम है, जिसने लाखों परिवारों के वर्तमान और भविष्य को संकट में डाल दिया है।
मौजूदा समय में नीट-यूजी, जेईई और सीयूईटी जैसी अत्यधिक केंद्रीकृत प्रवेश परीक्षाओं ने देश के किशोरों को एक अंतहीन अंधी दौड़ में धकेल दिया है। सीमित सीटों और रोजगार के संकुचित अवसरों के बीच, कोचिंग उद्योग इस कमी को दूर करने के बजाय इसी लाचारी पर फल-फूल रहा है। इसके चलते स्कूली शिक्षा का महत्व लगातार घट रहा है और स्कूल महज ‘डमी’ संस्थानों में तब्दील होते जा रहे हैं। परीक्षाओं की शुचिता सुनिश्चित करने और कोचिंग व्यवस्था को विनियमित करने के लिए बनाई गई विनीत जोशी कमेटी की सिफारिशें भी सतही नजर आती हैं, क्योंकि वे समस्या की मूल जड़ तक पहुंचने में नाकाम हैं। पेपर लीक और परीक्षा निरस्त होने जैसी कुप्रथाएं अब केवल चुनिंदा परीक्षाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह घुन राज्यों की शिक्षक पात्रता परीक्षाओं जैसी जमीनी स्तर की प्रणालियों तक पहुंच चुका है।
वास्तविक संकट केवल आर्थिक या प्रशासनिक नहीं, बल्कि गहरा बौद्धिक और नैतिक है। विज्ञापन और पेड न्यूज़ के जाल ने आज मीडिया के एक बड़े हिस्से को कोचिंग इंडस्ट्री का पैरोकार बना दिया है, जिसके चलते सच्चाई दिखाने के बजाय भ्रामक विज्ञापनों और ‘टॉपर्स’ की सुनियोजित नुमाइश के जरिए छात्रों और अभिभावकों को लगातार गुमराह किया जा रहा है।
लखनऊ अग्निकांड के बाद मीडिया की सुर्खियों में छाए मुरादाबाद के स्कॉलर्स डेन इंस्टीट्यूट जैसे संस्थान भी शिक्षा के मूल सिद्धांतों को किनारे रख मुनाफे और तालाबंदी के बाद आनलाइन कोचिंग वैकल्पिक व्यवस्था का अभिभावकों को भरोसे जैसे भ्रामक प्रचार के इसी समानांतर तंत्र का हिस्सा बने हुए हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच और नियमन बेहद जरूरी हो गया है।
वर्तमान केंद्रीकृत परीक्षा ढांचा अब प्रतिभा की निष्पक्ष कसौटी बनने के बजाय एक ऐसे जुए में बदल चुका है, जहां प्रश्नपत्र खरीद-बिक्री की वस्तु बन गए हैं। यह व्यवस्था छात्रों से उनकी जिज्ञासा, मौलिक सोच और रचनात्मकता छीनकर उन्हें महज परीक्षा पास करने की मशीन बना रही है। अलीगंज हादसे जैसी त्रासदियां यह साफ करती हैं कि जब तक अपने आपको कानून से ऊपर समझने वाले दंभी कोचिंग सेंटर की मनमानियों के खिलाफ़ कठोर कानूनी कार्रवाई अमल में नहीं लाई जाएगी, तब तक केवल औचक निरीक्षण तालाबंदी जैसे फौरी उपायों से इस ध्वस्त होती व्यवस्था को संभालना असंभव होगा@INN
