लेखक : महिपाल सिंह
अमरोहा , 20 अगस्त। पश्चिम उत्तर प्रदेश में त्योहारों से ठीक पहले चीनी की थोक कीमतों में करीब 32 प्रतिशत के तेज उछाल ने जहां आम उपभोक्ताओं और सरकार की चिंता बढ़ा दी है, वहीं दूसरी ओर गन्ना किसानों ने अपने तीन दशकों के बकाया भुगतान पर 15 प्रतिशत ब्याज का पाई-पाई हिसाब मांगने के लिए मोर्चा खोल दिया है। राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के आह्वान पर जिला गन्ना अधिकारी कार्यालयों और सहकारी गन्ना विकास समितियों पर किसानों का आज़ से अनिश्चितकालीन धरना शुरू हो गया है।
संगठन के संयोजक सरदार वी. एम. सिंह की अवमानना याचिका पर माननीय उच्च न्यायालय द्वारा 16 जुलाई 2026 को सुनाए गए ऐतिहासिक आदेश का हवाला देते हुए किसानों ने प्रशासन को एक विशेष मांगपत्र-प्रारूप सौंपना शुरू किया है। इस मांगपत्र में स्पष्ट उल्लेख है कि माननीय उच्च न्यायालय की टिप्पणी के अनुसार जब किसान गन्ने की फसल उगाने के लिए बैंक और समितियों से लिए गए ऋण पर भारी ब्याज व पेनल्टी भरता है, तो चीनी मिलों द्वारा नियमानुसार 14 दिनों से अधिक विलंबित भुगतान पर देय ब्याज को किसी भी स्थिति में माफ नहीं किया जा सकता।

उच्च न्यायालय द्वारा गन्ना आयुक्त को गन्ना पेराई सत्र 1996-97 से लेकर 2025-26 तक के समूचे 30 वर्षों के विलंबित भुगतान पर 15 प्रतिशत की वार्षिक दर से ब्याज भुगतान कराने का कड़ा निर्देश जारी किया गया है। इसी आलोक में किसानों ने अपनी गन्ना समिति, कृषक कोड, गांव और मोबाइल नंबर के विवरण के साथ औपचारिक प्रार्थना पत्र सौंपकर वर्षवार और किसानवार पारदर्शी रिकॉर्ड सार्वजनिक करने की मांग की है।
संगठन के पश्चिमी उत्तर प्रदेश संगठन प्रभारी उपेंद्र सिंह के अनुसार प्रशासनिक अधिकारी फिलहाल केवल पिछले तीन वर्षों का सीमित ब्यौरा दिखाकर औपचारिकता पूरी करने का प्रयास कर रहे हैं, जबकि किसान न्यायालय के आदेशानुसार पूरे तीन दशक का प्रमाणिक हिसाब लेकर ही दम लेंगे। एक तरफ जहां मुजफ्फरनगर जैसे प्रमुख थोक बाजारों में एम-ग्रेड चीनी के एक्स-फैक्ट्री भाव 4,400 रुपये से उछलकर 5,800 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच चुके हैं और खुदरा बाजारों में चीनी 58 से 60 रुपये प्रति किलो तक बिक रही है, वहीं किसानों का कहना है कि चीनी की इस आसमान छूती महंगाई का लाभ केवल मिल मालिकों और बिचौलियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

केंद्र सरकार द्वारा 1 अगस्त से 30 नवंबर तक व्यापारियों के लिए 4,000 क्विंटल की स्टॉक सीमा लागू करने और 14 अगस्त को चीनी निदेशालय द्वारा आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत कार्रवाई की चेतावनी दिए जाने के बावजूद बाजार की तेजी थम नहीं रही है। ऐसे माहौल में अन्नदाता का यह सीधा सवाल प्रशासनिक व व्यापारिक तंत्र को कटघरे में खड़ा करता है कि जब बाजार में चीनी के दाम लगातार रिकॉर्ड बना रहे हैं, तो दशकों से पाई-पाई को तरस रहे किसान को उसकी फसल का न्यायसंगत मूल्य और न्यायालय द्वारा स्वीकृत 15 फीसदी ब्याज का पारदर्शी हिसाब मिलने में देरी क्यों की जा रही है। जब तक हर किसान के हिस्से का पूर्ण और प्रमाणित ब्याज ब्यौरा सामने नहीं आता, तब तक यह आंदोलन बदस्तूर जारी रहेगा।
( लेखक, स्तंभकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं/INN)
