सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) कानून के कुछ प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि कानून में आरोपी के उत्पीड़न से बचाव के लिए पहले से ही पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं।
याचिकाकर्ता बृजभूषण सैनी की ओर से वरिष्ठ वकील विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि बिना प्रारंभिक जांच के FIR दर्ज करने और आरोपी की गिरफ्तारी का प्रावधान कानून के दुरुपयोग की आशंका पैदा करता है। उन्होंने यह भी कहा कि कानून की धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत का रास्ता भी बंद है।
सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता को मुकदमे की शुरुआत में ही मुआवजा दिए जाने के प्रावधान पर भी सवाल उठाया गया। जैन ने राज्यसभा में दी गई जानकारी का हवाला देते हुए मुआवजे की राशि का मुद्दा उठाया। इस पर जस्टिस जोयमाल्या बागची ने उनकी दलील को ‘क्रूर’ बताते हुए रोक दिया।
चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट 2020 में ही SC/ST एक्ट के प्रावधानों और उसमें किए गए बदलावों को बरकरार रख चुका है। ऐसे में करीब छह साल बाद उस फैसले की दोबारा समीक्षा करने का कोई आधार नजर नहीं आता।
2018 में भी हुआ था विवाद
इससे पहले 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने सुभाष काशीनाथ महाजन मामले में SC/ST एक्ट के तहत गिरफ्तारी और FIR को लेकर कुछ सुरक्षा उपाय सुझाए थे। इनमें गिरफ्तारी से पहले अनुमति और FIR दर्ज करने से पहले DSP स्तर के अधिकारी से प्रारंभिक जांच जैसी शर्तें शामिल थीं।
इस फैसले के बाद व्यापक विरोध हुआ, जिसके बाद संसद ने कानून में संशोधन करते हुए धारा 18A जोड़ी। इसके तहत FIR दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की आवश्यकता नहीं रखी गई और गिरफ्तारी के लिए पूर्व अनुमति की शर्त भी हटा दी गई।
इसके बाद 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने इन कानूनी बदलावों को सही ठहराया था। मौजूदा याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए कोर्ट ने इसी पुराने फैसले का हवाला दिया।
