अमरोहा, 25 सितंबर। उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले में कीटनाशक के जहरीले असर से एक किसान की मौत हो गई, जिससे पूरे गांव में मातम छा गया है। मंडी धनौरा थाना क्षेत्र स्थित जेथल मुस्तकम गांव में बुधवार को खेत में कीटनाशक का छिड़काव करते समय 50 वर्षीय किसान गजेंद्र जाटव की हालत अचानक बिगड़ गई थी। परिजनों ने उन्हें तुरंत स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया, जहां से गंभीर स्थिति को देखते हुए उन्हें मेरठ रेफर कर दिया गया। शुक्रवार तड़के इलाज के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया।
जब परिजन शव को गांव लेकर पहुंचे, तो परिवार में कोहराम मच गया। मृतक गजेंद्र के परिवार में एक विवाहित बेटा और दो अविवाहित बेटियां हैं। थाना प्रभारी सत्येंद्र सिरोहा ने बताया कि शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है और रिपोर्ट आने के बाद ही मौत के सही कारणों का स्पष्ट खुलासा हो सकेगा।
किसान गजेंद्र जाटव की मौत महज़ एक हादसा नहीं, बल्कि उस बड़े और गंभीर खतरे की ओर इशारा करती है जो खेतों से निकलकर अब आम लोगों की थाली और रसोई तक पहुंच चुका है। कृषि वैज्ञानिकों और सरकारी अध्ययनों के अनुसार, कीटनाशकों का अनियंत्रित इस्तेमाल अब केवल छिड़काव करने वाले किसान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गन्ना, गेहूं, धान, फल और सब्जियों के माध्यम से यह जहर सीधे मानव शरीर में प्रवेश कर रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, देश में हर साल खेतों से करीब 70 हजार टन कीटनाशक जमीन में रिसकर भूजल और नदियों को प्रदूषित कर रहा है, जिससे सिंचाई और पेयजल व्यवस्था गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है।
इस समस्या का एक और चिंताजनक पहलू दुधारू पशुओं और दूध उत्पादन से जुड़ा हुआ है। जब मवेशी कीटनाशकयुक्त चारा और भूसा खाते हैं, तो यह विषैला प्रभाव उनके दूध में भी उतर आता है। भारत के पांच प्रमुख शहरों में किए गए एक वैज्ञानिक अध्ययन के दौरान गाय-भैंस के दूध के लगभग 1200 नमूनों की जांच की गई, जिनमें एचसीएच, डीडीटी, एंडोसल्फान, साइपरमेथ्रिन और क्लोरपाइरीफॉस जैसे घातक कीटनाशकों के अवशेष पाए गए। कई नमूनों में इनकी मात्रा तय सुरक्षित मानक सीमा से भी अधिक पाई गई।
शोधकर्ताओं के अनुसार, बच्चों में इन कीटनाशकों के असर से होने वाला कैंसर जोखिम अमेरिकी पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी के तय मानकों से भी ऊपर पाया गया है, जो मुख्य रूप से दूध पर निर्भर बच्चों के स्वास्थ्य के लिए एक बेहद गंभीर चेतावनी है।
कीटनाशकों का यह घातक प्रभाव अब केवल प्रयोगशालाओं की रिपोर्टों तक सीमित न रहकर गांवों में प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देने लगा है। पंजाब में रासायनिक खादों और कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से कैंसर के बढ़ते मामलों को देखते हुए बरनाला जिले के दर्जनों गांवों की हजारों महिलाएं जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए आगे आई हैं।
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) की रिपोर्टों में भी कीटनाशकों और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के बीच सीधा संबंध बताया गया है। वहीं, पड़ोसी राज्य हरियाणा की विधानसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार बीते वर्ष सबसे अधिक कैंसर से मौतें फरीदाबाद में दर्ज की गई थीं।
एक दौर था जब ग्रामीण क्षेत्रों के लोग अपने खान-पान और जीवनशैली के कारण शहरों की तुलना में अधिक स्वस्थ और लंबी उम्र जीने के लिए जाने जाते थे। हालांकि, आज स्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। खेतों में अंधाधुंध रासायनिक कीटनाशकों के उपयोग, दूषित चारे से प्राप्त दूध और खाद्य पदार्थों के माध्यम से गांव-गांव में कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों के मरीज सामने आ रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति कृषि उत्पादन बढ़ाने की अंधी दौड़ का दुष्परिणाम है, जिसमें मिट्टी, जल, पशुधन और जनस्वास्थ्य की अनदेखी की गई है। अमरोहा में हुई किसान की मौत एक स्पष्ट चेतावनी है कि जब तक कीटनाशकों के प्रयोग पर कड़े नियम और सुरक्षित कृषि विकल्पों को लागू नहीं किया जाता, तब तक खेत से थाली तक फैला यह ज़हरीला चक्र रुकने वाला नहीं है।
इसी गंभीर मुद्दे पर ग्राम प्रधान संघ उत्तर प्रदेश संगठन से जुड़े वरिष्ठ नेता नरेंद्र कटारिया ने ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती बीमारियों और स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति पर सरकार की नीति पर तीखा सवाल खड़ा किया है। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य और इलाज की व्यवस्था तो दूर की बात है, सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार गांव-गांव में फैल रही गंभीर बीमारियों के सर्वे की रिपोर्ट और आंकड़े सार्वजनिक क्यों नहीं करती?
नरेंद्र कटारिया ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि ग्रामीण इलाकों में बढ़ रहे कैंसर, सांस और कीटनाशकों के दुष्प्रभावों से जुड़ी बीमारियों के वास्तविक आंकड़े सार्वजनिक कर दिए जाएं, तो जमीनी स्तर पर फैली भयावह स्थिति उजागर हो जाएगी। उन्होंने मांग की कि सरकार को छुपाव की नीति छोड़कर आंकड़ों में पारदर्शिता लानी चाहिए ताकि इस संकट से निपटने के लिए ठोस कदम उठाए जा सकें@MP SINGH/INN
