अमरोहा, 01 अक्टूबर। भाकियू संयुक्त मोर्चा ने जेन जी की बात सुनने का दावा करने वाली केंद्र सरकार से पश्चिमी यूपी को पृथक राज्य बनाने की मांग पर यहां के युवाओं की रायशुमारी कराए जाने की मांग की है। गौरतलब है कि पृथक पश्चिम प्रदेश की मांग, नेताओं के हालिया बयानों से फिर से तूल पकड़ रही है, गांव गांव ‘किसान युवा संसद’ के जरिए इस मुद्दे पर जनमत संग्रह की मांग उठ रही है।
जेन जी यानी देश के युवा वर्ग की आकांक्षाओं और विचारों को प्राथमिकता देने का दावा करने वाली केंद्र सरकार के सामने अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश को पृथक राज्य बनाने के लिए युवाओं के बीच रायशुमारी कराने की मांग प्रमुखता से उठाई गई है। भारतीय किसान यूनियन (संयुक्त मोर्चा) के तत्वावधान में गांव-गांव चलाए जा रहे ‘किसान युवा संसद’ अभियान के दौरान युवाओं से संवाद के बाद संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने केंद्र सरकार से यह औपचारिक सर्वे कराने की अपील की है। नरेश चौधरी का दावा है कि जमीनी संवाद और बैठकों में पश्चिमी यूपी का युवा वर्ग स्पष्ट रूप से अपने अधिकारों, रोजगार और प्रशासनिक सुगमता के लिए पृथक ‘पश्चिम प्रदेश’ के गठन के पक्ष में अपनी राय जता रहा है।
इस नई मांग के सामने आने के बाद उत्तर प्रदेश के विभाजन और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को पृथक राज्य बनाने की दशकों पुरानी मांग एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में गरमा गई है।
भारतीय किसान यूनियन (संयुक्त मोर्चा) द्वारा गांव गांव चलाए जा रहे ‘किसान युवा संसद’ जनसंपर्क अभियान के बीच संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने केंद्र सरकार से मांग की है कि वह जनआकांक्षाओं को देखते हुए पश्चिमी उत्तर प्रदेश के युवाओं के बीच औपचारिक रायशुमारी (सर्वे) कराए।
नरेश चौधरी का दावा है कि गांव-गांव संवाद के दौरान क्षेत्र का युवा वर्ग अधिकारों, रोजगार और बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था के लिए पृथक राज्य के गठन के पक्ष में अपनी स्पष्ट राय दे रहा है।
इससे पूर्व, पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता डॉ. संजीव बालियान द्वारा हालिया बयान ने भी इस बहस को नए सिरे से हवा दे दी है। उन्होंने भौगोलिक दूरी का हवाला देते हुए मीडिया में कहा था कि उनके गांव से प्रयागराज स्थित हाईकोर्ट लगभग 750 किलोमीटर दूर है, जबकि लाहौर हाईकोर्ट यहां से अधिक समीप पड़ता है। उन्होंने सवाल उठाया कि करीब 25 करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश के पश्चिमी अंचल को एम्स और हाईकोर्ट बेंच जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए आज भी संघर्ष करना पड़ रहा है।
उल्लेखनीय है कि पृथक राज्य की यह मांग नई नहीं है। नवंबर 2011 में तत्कालीन मायावती सरकार ने उत्तर प्रदेश को पूर्वांचल, पश्चिम प्रदेश, बुंदेलखंड और अवध प्रदेश में विभाजित करने का प्रस्ताव विधानसभा से पारित कराकर केंद्र को भेजा था, जिसमें मुरादाबाद मंडल भी प्रस्तावित पश्चिम प्रदेश के खाके में शामिल था। उस समय शासन को जनता के करीब लाने और क्षेत्रीय असंतुलन दूर करने का तर्क दिया गया था। इसके अलावा, वर्ष 2000 में संसद में उत्तर प्रदेश पुनर्गठन विधेयक पर चर्चा के दौरान रालोद के संस्थापक चौधरी अजित सिंह ने भी पश्चिमी यूपी के संसाधनों व विकास के लिए पृथक राज्य की आवश्यकता पर बल दिया था।
इस विषय पर विभिन्न क्षेत्रों के प्रबुद्ध जनों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं। हाईकोर्ट बेंच स्थापना आंदोलन से जुड़े वरिष्ठ अधिवक्ता गजेंद्र नागर का कहना है कि पांच दशकों से चली आ रही इस मांग के पूरा होने से आम जनता को त्वरित व सुलभ न्याय मिलेगा। वहीं, व्यापारी नेता व युवा उद्यमी ईशान अग्रवाल के अनुसार, छोटे प्रशासनिक क्षेत्रों के गठन से स्थानीय व्यापार, उद्योग और संसाधनों का सीधा लाभ क्षेत्र के युवाओं व उद्यमियों को प्राप्त होगा।
2027 के आगामी विधानसभा चुनाव के दृष्टिगत अब यह मुख्य विचारणीय प्रश्न बन गया है कि प्रदेश की समस्याओं का समाधान मौजूदा ढांचे में प्रशासनिक विकेंद्रीकरण से निकाला जाएगा या छोटे राज्यों का गठन मुख्य राजनीतिक एजेंडा बनेगा। पश्चिमी यूपी में गन्ना विलंब ब्याज भुगतान, रोजगार, उद्योग और न्यायिक सुविधा जैसे मुद्दे पहले से मौजूद हैं, ऐसे में चुनावी दिशा तय करने में इन क्षेत्रीय प्राथमिकताओं की भूमिका अहम मानी जा रही है@MP SINGH/INN
