गजरौला। रासायनिक कारखानों की बेलगाम लापरवाही और प्रशासनिक मिलीभगत ने गजरौला को धीरे-धीरे मौत के कुएं में धकेल दिया है। शहबाजपुर डोर गांव में भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा का धरना सोमवार को 16वें दिन में प्रवेश कर गया, लेकिन ज़हरीले भूजल से त्रस्त ग्रामीणों की चीखें अब भी फाइलों में दबी हैं। किसानों का साफ आरोप है कि कारखानों से निकलने वाला रासायनिक अपशिष्ट जल ज़मीन के रास्ते भूजल में घुल चुका है। नतीजा—खेती बर्बाद, पीने का पानी जहरीला और गांव-गांव में कैंसर, अस्थमा व गंभीर बीमारियों का कहर। इसके बावजूद प्रशासन आंख मूंदे बैठा है।
भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने जांच व्यवस्था को ढकोसला करार देते हुए सनसनीखेज आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि कारखानों की जांच से पहले ही सूचना लीक हो जाती है, सैंपलिंग में जानबूझकर ढील दी जाती है और रिपोर्ट्स को मैनेज किया जाता है। कार्रवाई की नौबत आते ही फाइलें ठंडे बस्ते में डाल दी जाती हैं।
उन्होंने सवाल उठाया-“हाईटेक युग में भी वायु, जल और मिट्टी की जांच रिपोर्ट आने में सालों क्यों लगते हैं? इस देरी की कीमत ग्रामीण अपनी जान देकर क्यों चुकाएं?”

खुद प्रमुख सचिव अरुण सिद्धू यह स्वीकार कर चुके हैं कि प्रदूषण से प्रभावित करीब 40 गांवों में लोग गंभीर बीमारियों की चपेट में हैं। उन्होंने इंदौर की जल त्रासदी का हवाला दिया, जहां दूषित पानी से सैकड़ों लोग बीमार पड़े और 14 मौतें हुईं। किसानों का कहना है कि वही लापरवाही अब गजरौला में दोहराई जा रही है-“पहले अनदेखी, फिर हादसा, और बाद में जांच का दिखावा।”
भाकियू के प्रदेशाध्यक्ष रामकृष्ण चौहान ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि जनस्वास्थ्य के मामलों में कानून नहीं, दबाव और सौदेबाज़ी चलती है। उन्होंने दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स विलेज में प्रदूषित मिट्टी से मजदूरों की मौतों को याद दिलाते हुए कहा कि इतिहास गवाह है-“जब तक बड़ी त्रासदी नहीं होती, सिस्टम नहीं जागता।”
रविवार को पर्यावरण आयोग के सदस्य कारी फतेहउद्दीन खान कादरी ने धरनास्थल का दौरा कर जिलाधिकारी निधि गुप्ता वत्स को सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए। इसके बाद पांच सदस्यीय कमेटी गठित की गई, जिसे 15 दिन में रिपोर्ट देनी है। मगर किसानों का सवाल साफ है—“क्या यह रिपोर्ट भी बाकी रिपोर्टों की तरह फाइलों में दफ्न हो जाएगी?”
धरने में तेजिंदर चौधरी, ललित चौधरी, रिंकू सागर समेत सैकड़ों किसान डटे हुए हैं। ग्रामीणों का गुस्सा खुलकर सामने है—“कारखाने ज़हर उगल रहे हैं और अफसर उनकी ढाल बने हैं।”

आर्थिक विकास के नाम पर मानव जीवन को कुचला जा रहा है। संवेदनहीन तंत्र और जवाबदेही के अभाव ने गजरौला को एक संभावित औद्योगिक जल-त्रासदी के मुहाने पर ला खड़ा किया है।
सवाल अब टलने वाले नहीं हैं—
*कब तक ग्रामीण ज़हरीला पानी पीते रहेंगे?
*कब तक कारखानेदार कानून से ऊपर रहेंगे?
अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो गजरौला किसी नए इंदौर या भोपाल की तरह इतिहास में दर्ज होगा—और इसकी ज़िम्मेदारी सिस्टम की होगी।
