लोकतंत्र से जवाब मांगता गांव
अमरोहा। देश को आज़ाद हुए 77 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन अमरोहा जिले के गजरौला क्षेत्र का नाईपुरा गांव आज भी काले और जहरीले पानी की सजा भुगत रहा है, जिसे देखकर लोकतंत्र की आत्मा पर सवाल खड़े होते हैं। औद्योगिक विकास की चकाचौंध के बीच यह गांव ज़हरीले पानी, दूषित हवा और जहरीले माहौल में जीने को मजबूर है। यहां हैंडपंप या तो सूख चुके हैं या फिर फ्लोराइड, आर्सेनिक और आयरन जैसे घातक तत्वों से भरा पानी उगल रहे हैं।
सबसे भयावह तस्वीर यह है कि मासूम बच्चे बचपन से ही ज़हरीला पानी पीकर बड़े हो रहे हैं। उनके पास न तो शुद्ध पानी का विकल्प है और न ही कोई सुनने वाला। गांव की गलियों में बहता काला पानी और हवा में घुली तेज़ एसिटिक बदबू यहां के लोगों के लिए रोज़मर्रा की सच्चाई बन चुकी है। बदबू इतनी तीखी है कि रातों की नींद उड़ जाती है, सूंघने की क्षमता तक प्रभावित हो चुकी है और नई पीढ़ी ने कभी साफ हवा और पानी का अनुभव ही नहीं किया।
भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने इस हालात को लोकतंत्र की काली सच्चाई बताते हुए कहा कि विकास के नाम पर ग्रामीणों को ज़हर पिलाना किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकता। उन्होंने आरोप लगाया कि गजरौला की फैक्ट्रियों सेहै निकलने वाला रासायनिक कचरा वर्षों से जमीन, पानी और इंसानी जीवन को चुपचाप निगल रहा है। इसका असर लोगों की सांसों, उनके खून और बच्चों के भविष्य तक में साफ दिखाई देता है।
करीब एक महीने से नाईपुरा में किसानों का बेमियादी धरना लगातार जारी है। किसान संगठनों का कहना है कि सरकार की उदासीनता इस त्रासदी को और गहरा रही है। चुनाव के समय जल संकट जैसे मुद्दों पर बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन सत्ता में आते ही यही सवाल हाशिए पर चले जाते हैं। किसानों का आरोप है कि जिम्मेदारी तय करने के बजाय दोष गरीब ग्रामीणों पर मढ़ देना सबसे आसान रास्ता बना लिया गया है।

भाकियू के राष्ट्रीय सचिव चंद्रपाल सिंह ने बताया कि पूरे क्षेत्र में भूजल गंभीर रूप से दूषित हो चुका है। गरीब बस्तियां मजबूरी में ज़हरीला पानी पीने को अभिशप्त हैं। नीति आयोग की रिपोर्टें भी इस सच्चाई की गवाही देती हैं कि जल संकट का सबसे बड़ा बोझ समाज के कमजोर वर्गों को ही उठाना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि स्वच्छ पानी कोई सुविधा नहीं, बल्कि हर नागरिक का मौलिक अधिकार है।
अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रदेशाध्यक्ष एहसान अली ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि बोतलबंद पानी का मुनाफा कमाने वाले लोग सुरक्षित इलाकों में रहते हैं, जबकि स्थानीय लोग ज़हर के साये में जीवन काटने को मजबूर हैं। उन्होंने जांच एजेंसियों पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि सच्चाई सामने लाने के बजाय मामलों को दबाने की कोशिशें की जा रही हैं।
यह त्रासदी उस भारत का आईना है, जो चंद्रयान, डिजिटल इंडिया और वैश्विक उपलब्धियों पर गर्व करता है, लेकिन आज भी गांवों तक शुद्ध पानी पहुंचाने में असफल नजर आता है। सवाल यह नहीं कि समस्या क्या है, सवाल यह है कि कब तक विकास के नाम पर इंसानियत को ज़हर के हवाले किया जाता रहेगा?
धरना स्थल पर पूर्व जिला पंचायत सदस्य व बसपा नेता फारुख सैफी, जगदेव सिंह, एससी-एसटी मोर्चा के प्रदेशाध्यक्ष रिंकू सागर, अशोक कुमार, शाहरुख, जावेद अली, आसिफ चौधरी, शराफत चौधरी, तालिब चौधरी, मंसूर अली, मलखान सिंह, रामचरण सिंह, होमपाल सिंह, रघुवीर सिंह, रामप्रसाद सिंह सहित बड़ी संख्या में किसान मौजूद रहे।
