गजरौला। औद्योगिक विकास के नाम पर ग्रामीणों की जिंदगी से की जा रही खिलवाड़ अब खुलकर सड़कों पर आ गई है। अमरोहा जिले के गजरौला क्षेत्र में रासायनिक कारखानों से निकल रहे जहरीले कचरे ने नाईपुरा, तरौली समेत दर्जनों गांवों के भूजल और नदियों को गंभीर रूप से दूषित कर दिया है। हालात यह हैं कि हैंडपंप और ट्यूबवेल से पीला, काला और पेट्रोल जैसी दुर्गंध वाला पानी निकल रहा है, जो सीधे मौत का पैगाम बन चुका है।
दूषित पानी के सेवन से ग्रामीणों में दमा, कैंसर जैसी घातक बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है, वहीं फसलें बर्बाद और मवेशी बीमार हो रहे हैं। किसानों की आजीविका पर सीधा हमला हो रहा है, लेकिन प्रशासन आंखें मूंदे बैठा है।

इसी जनविरोध के चलते भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा ने दिसंबर 2025 के अंत में नेशनल हाईवे-9 के किनारे नाईपुरा के शहबाजपुर डोर पर अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया था, जो एक महीने से अधिक समय बाद भी लगातार जारी है। ठंड, उपेक्षा और प्रशासनिक उदासीनता के बावजूद आंदोलन कमजोर नहीं पड़ा, बल्कि और धारदार होता जा रहा है।
25 जनवरी को आंदोलन ने नया मोड़ ले लिया, जब बड़ी संख्या में महिलाएं और गृहणियां धरना स्थल पर पहुंचीं। मातृशक्ति ने प्रदूषण के खिलाफ जमकर नारेबाजी करते हुए साफ कर दिया कि अब यह लड़ाई सिर्फ किसानों की नहीं, बल्कि पूरे समाज के स्वास्थ्य और भविष्य की है।

धरना स्थल पर भाकियू संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी, प्रदेशाध्यक्ष रामकृष्ण चौहान, ओमप्रकाश दरोगा, अल्पसंख्यक मोर्चा प्रभारी एवं मंडलाध्यक्ष एहसान अली सहित अन्य नेताओं ने दो टूक शब्दों में कहा कि जब तक दोषी कारखानों पर सख्त कार्रवाई, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की निष्पक्ष जांच, दूषित जल की सफाई और प्रभावित ग्रामीणों को मुआवजा नहीं मिलेगा, आंदोलन नहीं रुकेगा।
प्रशासन द्वारा गठित जांच समिति पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। किसानों का आरोप है कि रिपोर्ट दबाई जा रही है और जानबूझकर कार्रवाई में देरी की जा रही है। अब यह धरना केवल पानी की समस्या नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, पर्यावरण और सम्मानपूर्वक जीवन के अधिकार की निर्णायक लड़ाई बन चुका है।

कड़ाके की ठंड में डटे किसान और महिलाएं साफ चेतावनी दे रहे हैं—
या तो जहर बंद होगा, या आंदोलन और उग्र होगा।
गजरौला की औद्योगिक तरक्की की कीमत अगर गांवों की सांसों से वसूली जाएगी, तो यह संघर्ष और भी तेज होगा।
