अमरोहा। उत्तर प्रदेश के अमरोहा में पत्रकारिता की स्वतंत्रता, सरकारी पारदर्शिता और मीडिया की संस्थागत मान्यता से जुड़े गंभीर मुद्दों को लेकर पत्रकारों ने गहरी चिंता व्यक्त की है। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त पत्रकार समिति एवं स्वतंत्र पत्रकारों की ओर से जारी बयान में कहा गया कि हाल के वर्षों में मीडिया और शासन के बीच संवाद की परंपरागत व्यवस्था कमजोर हुई है, जिसका सीधा असर लोकतांत्रिक मूल्यों पर पड़ रहा है।
स्वतंत्र पत्रकार एवं विचारक डॉ. महताब अमरोहवी ने अपने बयान में कहा कि कोविड-19 के दौरान मान्यता प्राप्त पत्रकारों को मिलने वाली रेल किराया छूट—जो दशकों पुरानी सुविधा थी—स्थायी रूप से समाप्त कर दी गई। हैरानी की बात यह है कि संसद में कई सांसदों द्वारा यह मुद्दा उठाए जाने के बावजूद अब तक इसकी बहाली को लेकर कोई ठोस घोषणा नहीं की गई है।
उन्होंने कहा कि इसी तरह प्रेस कॉन्फ्रेंस का स्वरूप भी बदल चुका है। पारंपरिक खुले सवाल-जवाब सत्र लगभग समाप्त हो गए हैं और सूचना का प्रवाह अब सीमित होकर अधिकतर एकतरफा माध्यमों—जैसे प्रेस विज्ञप्तियों, सोशल मीडिया पोस्ट और चुनिंदा इंटरव्यू—तक सिमट गया है। गणतंत्र दिवस सहित अन्य राष्ट्रीय आयोजनों में पत्रकारों को आमंत्रित किए जाने की प्रक्रिया भी पहले की तुलना में काफी सीमित हो गई है। कई जिलों में मान्यता प्राप्त पत्रकारों की स्थायी समितियों की बैठकें या तो बंद पड़ी हैं या केवल औपचारिकता बनकर रह गई हैं।
मान्यता प्राप्त पत्रकार समिति के संरक्षक तुलाराम ठाकुर ने सवाल उठाया कि क्या यह सब केवल आर्थिक या स्वास्थ्य आधारित निर्णय हैं, या फिर यह एक सोची-समझी प्रक्रिया है, जिसके तहत लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की भूमिका को कमजोर किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मीडिया को धीरे-धीरे “विशेष जिम्मेदारी निभाने वाले संस्थागत समूह” से हटाकर सामान्य नागरिक की श्रेणी में समेटने की प्रवृत्ति चिंताजनक है।
समिति के सचिव डॉ. तारिक अज़ीम और उपाध्यक्ष बी.एस. आर्य ने संयुक्त रूप से कहा कि आगे क्या-क्या सुविधाएं और संवाद के माध्यम समाप्त होंगे, यह भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इतिहास गवाह है कि जब शासन और प्रेस के बीच दूरी बढ़ती है, तो सबसे पहले लोकतंत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही प्रभावित होती है।
उन्होंने उम्मीद जताई कि पत्रकार समुदाय, नागरिक समाज और विपक्षी दल इन मुद्दों को लगातार उठाते रहेंगे, क्योंकि लोकतंत्र में “सवाल पूछने का अधिकार” किसी रियायत, सुविधा या आमंत्रण पर निर्भर नहीं होना चाहिए।
संक्षेप में, यह मामला केवल सुविधाओं का नहीं, बल्कि पत्रकारिता के संस्थागत सम्मान और स्वतंत्र आवाज़ के संरक्षण से जुड़ा गंभीर संकट है।
