बहुजन समाज पार्टी (BSP) की प्रमुख मायावती ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ का पुरजोर समर्थन किया है।
उनके बयान के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं:
- विरोध को बताया नाजायज: मायावती ने कहा कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव खत्म करने के लिए ‘इक्विटी कमेटी’ (समता समिति) का गठन एक सही कदम है। उन्होंने सवर्णों द्वारा किए जा रहे विरोध को “जातिवादी मानसिकता” का परिणाम बताया और इसे पूरी तरह अनुचित करार दिया।
- विश्वास में लेने की जरूरत: हालांकि उन्होंने केंद्र सरकार को सुझाव दिया कि इतने संवेदनशील नियम को लागू करने से पहले सभी वर्गों को विश्वास में लेना चाहिए था। उन्होंने चेतावनी दी कि बिना व्यापक परामर्श के ऐसे कदम उठाने से देश में सामाजिक तनाव पैदा हो सकता है।
- दबे-कुचले वर्गों को सलाह: उन्होंने दलितों, पिछड़ों और वंचित वर्गों के छात्रों व शिक्षकों से अपील की कि वे उन “स्वार्थी और बिकाऊ नेताओं” के भड़काऊ बयानों में न आएं जो इस मुद्दे पर अपनी राजनीति चमकाना चाहते हैं।
- नियमों का महत्व: उनके अनुसार, ये नए नियम कैंपस में होने वाले उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान करने के लिए आवश्यक हैं।
विवाद का कारण: 15 जनवरी 2026 से लागू इन नियमों के तहत कॉलेजों में भेदभाव की शिकायतों के लिए समितियां बनाना अनिवार्य है। सवर्ण समाज का तर्क है कि इन कमेटियों में उनके प्रतिनिधित्व का स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जिससे नियमों के दुरुपयोग की आशंका है। इसी विरोध के बीच उत्तर प्रदेश के बरेली में सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने अपने पद से इस्तीफा भी दे दिया है।
