प्रदूषण, नकली दवाइयों और अंतरराष्ट्रीय ट्रेड डील पर किसानों की गहरी चिंता
अमरोहा। अमरोहा जिले के औद्योगिक क्षेत्र गजरौला में नाईपुरा और आसपास के गांवों में फैली दूषित पानी की गंभीर समस्या अब राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल का रूप ले चुकी है। फैक्ट्रियों से निकलने वाला जहरीला औद्योगिक अपशिष्ट भूजल, नदियों, बोरिंगों और हैंडपंपों को बुरी तरह प्रदूषित कर रहा है, जिससे ग्रामीण इलाकों में गंभीर बीमारियां तेजी से फैल रही हैं।

भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के प्रमुख सचिव अरुण सिद्धू ने कहा कि भूमिगत जल प्रदूषण ने लोगों के जीवन पर गहरा असर डाला है। उन्होंने आरोप लगाया कि क्षेत्र में नियमों के बजाय फैक्ट्रियों की मनमानी चल रही है। सिद्धू ने कहा कि यह समस्या केवल स्थानीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर की चुनौती बन चुकी है, जिसके समाधान के लिए ठोस योजना और पर्याप्त बजट की सख्त जरूरत है।

इन्हीं मांगों को लेकर शहबाजपुर डोर गांव में भाकियू संयुक्त मोर्चा का बेमियादी धरना सोमवार को 51वें दिन में प्रवेश कर गया। किसान लगातार प्रदूषण फैलाने वाली फैक्ट्रियों और प्रशासनिक उदासीनता के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं।
नकली दवाइयों और खाद्य पदार्थों से बढ़ा स्वास्थ्य संकट
धरना स्थल पर वक्ताओं ने एक और गंभीर मुद्दा उठाते हुए कहा कि देश में नकली दवाइयों और खाद्य पदार्थों का रैकेट तेजी से फैल रहा है। लिव-52, कफ सिरप, कैंसर की दवाइयों से लेकर रियल जूस, दूध और पनीर तक नकली पाए जा रहे हैं, जो आम जनता के स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं। किसानों ने इसे सिस्टम की विफलता करार देते हुए सख्त कार्रवाई की मांग की।

अंतरराष्ट्रीय समझौतों से भारतीय किसानों पर खतरा
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका और बांग्लादेश के बीच हुए समझौते को लेकर भी किसानों ने चिंता जताई। बताया गया कि बांग्लादेश ने अमेरिका से गेहूं खरीदना शुरू कर दिया है, जिसकी पहली बड़ी खेप 5 फरवरी को चटगांव पहुंच चुकी है। वर्ष 2020 में भारत के कुल गेहूं निर्यात का करीब 50 प्रतिशत बांग्लादेश को गया था, लेकिन अब भारतीय गेहूं निर्यात पर दबाव बढ़ गया है।
इसके साथ ही भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर किसानों में आशंका है कि अमेरिकी कृषि को मिलने वाली भारी सब्सिडी के चलते यदि टैरिफ कम या समाप्त हुआ तो सस्ती अमेरिकी फसलें—मक्का, सोयाबीन और कपास—भारतीय बाजार में भर जाएंगी, जिससे देश के किसानों को भारी नुकसान होगा।
डेयरी सेक्टर पर ₹1 लाख करोड़ का खतरा
किसान नेताओं ने चेतावनी दी कि इस ट्रेड डील से भारत के डेयरी सेक्टर पर करीब ₹1 लाख करोड़ का खतरा मंडरा रहा है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है और करीब 8 करोड़ परिवारों की आजीविका इससे जुड़ी है। हालांकि हालिया रिपोर्ट्स में संवेदनशील कृषि उत्पादों—गेहूं, चावल, दूध, पोल्ट्री आदि—को संरक्षित रखने के दावे किए गए हैं, लेकिन किसानों का भरोसा अभी डगमगाया हुआ है।
कारपोरेट्स को फायदा, छोटे किसान तबाही की कगार पर
भाकियू संयुक्त मोर्चा के अल्पसंख्यक मोर्चा प्रभारी एवं मंडलाध्यक्ष एहसान अली ने कहा कि देश के कई बड़े नेता और मंत्रियों के बच्चे अमेरिका में रहते या पढ़ते हैं, जिससे यह सवाल उठता है कि वे देशहित को कितनी प्राथमिकता देंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि यह डील कुछ बड़े कारपोरेट्स के लिए फायदेमंद साबित होगी, जो आयात से मुनाफा कमाकर भारतीय फसलें सस्ती खरीदेंगे और महंगे दामों पर बेचेंगे, जबकि छोटे किसान तबाह होकर सस्ते मजदूर बनने को मजबूर हो जाएंगे।
एहसान अली ने कहा कि किसान समाज जाति, धर्म, क्षेत्र, जोत और फसल के आधार पर सबसे ज्यादा बंटा हुआ है। छोटे किसानों के लिए खेती अब केवल सर्वाइवल की लड़ाई बन चुकी है। उनके बच्चे खेती छोड़कर शहरों और विदेशों की ओर पलायन कर रहे हैं। गजरौला जैसे क्षेत्रों में रासायनिक कारखानदारों ने किसानों की जमीन खरीद ली है और अब उन्हीं से खेती कराई जा रही है। उन्होंने चेताया कि जमीन बिकने के बाद केवल 5 प्रतिशत लोग ही सर्वाइव कर पाते हैं, बाकी लोग हाशिये पर चले जाते हैं। उन्होंने पूंजीवाद के क्रूर रूप को मध्यम और निम्न वर्ग के लिए घातक बताते हुए कहा कि किसानों और नीति-निर्माताओं को मिलकर ऐसा मॉडल विकसित करना होगा, जो किसानों को इस गहरे संकट से बचा सके।
इस मौके पर प्रदेश अध्यक्ष रामकृष्ण चौहान, होमपाल सिंह, हाजी अख्तर, जाहिद हुसैन, सोमपाल सिंह, रामशरण सिंह, इस्लाम चौधरी, गंगाराम सिंह, ओम प्रकाश, समरपाल सिंह, असद अली, महेंद्र सिंह, शीशपाल सिंह, जसवंत सिंह सहित बड़ी संख्या में किसान मौजूद रहे।
