अमरोहा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गजरौला क्षेत्र के नाईपुरा समेत आसपास के कई गांवों में रासायनिक कारखानों से निकलने वाले जहरीले अपशिष्ट ने भूजल को गंभीर रूप से दूषित कर दिया है। हालात ऐसे हैं कि ग्रामीणों को पीने योग्य पानी तक नसीब नहीं हो रहा, जबकि किसान असाध्य बीमारियों, पशुधन के नुकसान और फसलों की गिरती पैदावार से जूझ रहे हैं।

ग्रामीणों का आरोप है कि कारखानों से निकलने वाला रासायनिक कचरा खुलेआम जमीन और जल स्रोतों में मिल रहा है, जिससे मिट्टी की उर्वरता प्रभावित हो रही है। दुधारू पशुओं के बीमार पड़ने और दूध उत्पादन में गिरावट से किसानों की आजीविका पर सीधा असर पड़ा है।

दो माह से जारी बेमियादी धरना
इस गंभीर समस्या के विरोध में भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के बैनर तले शहबाजपुर डोर में किसान पिछले दो महीनों से बेमियादी धरने पर बैठे हैं। किसानों की मांग है कि दूषित जल की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए, प्रदूषण पर तत्काल रोक लगे और प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा दिया जाए।

भाकियू संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने कहा कि विकास का अर्थ केवल उद्योगों की आर्थिक प्रगति नहीं, बल्कि पर्यावरण और समाज के साथ संतुलन भी है। उन्होंने समुद्र मंथन की पौराणिक कथा का उल्लेख करते हुए कहा कि कारखाने आर्थिक “अमृत” तो पा रहे हैं, लेकिन उससे निकलने वाला “हलाहल” किसानों और पर्यावरण को निगल रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि इस विष का जिम्मा आखिर कौन लेगा—कारखाना मालिक, निगरानी एजेंसियां या जिम्मेदार अधिकारी?

प्रमुख सचिव अरुण सिद्धू ने भी माना कि विज्ञान और अर्थव्यवस्था की तरक्की के नाम पर मिट्टी और जल को जहर बनाना किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकता।
किसान अर्थव्यवस्था की रीढ़, फिर भी उपेक्षित
प्रदेशाध्यक्ष रामकृष्ण चौहान ने कहा कि देश का किसान भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, लेकिन वही आज विषमता और उपेक्षा का शिकार है। इससे किसानों का विश्वास जनप्रतिनिधियों और प्रशासन पर लगातार कम होता जा रहा है। उन्होंने कहा कि जल, जंगल और जमीन साझा विरासत हैं और यह मुद्दा किसी धर्म, जाति या वर्ग विशेष का नहीं, बल्कि पूरे समाज और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा है।

अल्पसंख्यक मोर्चा प्रभारी एवं मंडलाध्यक्ष एहसान अली ने कहा कि संगठन का मुख्य फोकस दूषित जल से मुक्ति और कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) फंड के पारदर्शी व प्रभावी उपयोग पर है, ताकि प्रभावित गांवों में स्वच्छ जल और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें।
प्रशासन पर निष्क्रियता के आरोप
धरने पर बैठे किसानों का आरोप है कि शिकायतों के बावजूद प्रशासन ने अब तक ठोस कार्रवाई नहीं की है। आंदोलनकारियों का कहना है कि जब तक भूजल प्रदूषण की स्वतंत्र जांच, दोषियों के खिलाफ कार्रवाई और पीड़ितों को मुआवजा सुनिश्चित नहीं होता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।

धरने में सुरजीत सिंह, सुरेंद्र सिंह (प्रधान), सुधीर कुमार (प्रधान), बिगराज सिंह, गंगाराम सिंह, मंसूर अली, रामप्रसाद सिंह, सादिक अली, समरपाल सैनी, सोमपाल सिंह, होमपाल सिंह, विजय सिंह, नन्नू सैफी, दिगराज सिंह समेत प्रभावित गांवों के अनेक किसान मौजूद रहे।
यह आंदोलन न केवल स्थानीय पर्यावरण संकट की ओर इशारा करता है, बल्कि सतत विकास और औद्योगिक जवाबदेही पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।
