मुरादाबाद। होली पर्व को पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए शहर में व्यापक तैयारियां चल रही हैं। इस बार रासायनिक रंगों की जगह फूलों और प्राकृतिक सामग्री से बने हर्बल गुलाल का निर्माण किया जा रहा है, वहीं होलिका दहन के लिए गाय के गोबर से तैयार उपलों और लकड़ियों का उपयोग किया जाएगा। पहल का उद्देश्य पेड़ों की कटाई पर रोक, गो-संरक्षण को बढ़ावा और प्रदूषण रहित उत्सव मनाना है।

शहर की गौशालाओं में बड़े पैमाने पर गोबर से उपले और लकड़ियां तैयार की जा रही हैं। इन उपलों में कपूर, चंदन, पुष्प-सुगंध और अन्य प्राकृतिक तत्व मिलाए जा रहे हैं, ताकि होलिका दहन के दौरान सुगंधित और कम धुआं उत्पन्न हो। बताया जा रहा है कि इस वर्ष 10 हजार से अधिक गोबर उपले तैयार किए जा रहे हैं।

उधर मझोला क्षेत्र के मनोहरपुर स्थित कृषि प्रशिक्षण केंद्र में प्राकृतिक गुलाल बनाने का कार्य तेजी से जारी है। यहां आरारोट के आधार पर गुलाब की पंखुड़ियां, जयंती के फूल, दालचीनी के पत्ते, अपराजिता के फूल, गेंदे के फूल, हल्दी, तेजपत्ता, कपूर और चुकंदर जैसी सामग्री से विभिन्न रंगों का गुलाल तैयार किया जा रहा है। इस बार सिंदूरी (गेरुआ) रंग के लिए विशेष पौधों के पत्ते और बीज का उपयोग किया जा रहा है।

केंद्र के संचालक ने बताया कि हर्बल गुलाल की मांग लगातार बढ़ रही है। अब तक करीब 800 किलोग्राम गुलाल की बिक्री हो चुकी है। दिल्ली, भोपाल, लुधियाना, आगरा, बरेली और नोएडा समेत कई शहरों से ऑनलाइन ऑर्डर प्राप्त हुए हैं। कई संस्थाएं और कंपनियां भी इस प्राकृतिक गुलाल को प्राथमिकता दे रही हैं।

निर्माताओं का दावा है कि इन रंगों में किसी प्रकार के रासायनिक तत्व का प्रयोग नहीं किया जाता, जिससे यह बच्चों और संवेदनशील त्वचा वाले लोगों के लिए भी सुरक्षित हैं। प्राकृतिक और सुरक्षित होली की ओर बढ़ते रुझान के बीच मुरादाबाद का हर्बल गुलाल इस बार कई राज्यों में रंग बिखेरने के लिए तैयार है।
