मुरादाबाद। इन दिनों जमीन कम और “दावे” ज्यादा उग रहे हैं, और जब हकीकत की धूप पड़ी तो कई दावे अपने आप ही मुरझा गए। ताजा मामला शहर के मेयर विनोद कुमार अग्रवाल से जुड़ा है, जिनकी बाउंड्री पर चला बुलडोजर अब एक दिलचस्प कहानी बन चुका है।
करीब छह दिन पहले जिस जमीन को मेयर साहब अपनी समझकर घेराबंदी करवा चुके थे, अब वही जमीन प्रशासन की पैमाइश में “सरकारी निकली”-यानी मामला कुछ ऐसा हो गया कि “अपना समझा था, निकला सरकार का!”
“पहले गरजे, फिर नरम पड़े”
जब बाउंड्री टूटी थी, तब मेयर साहब का गुस्सा किसी चुनावी भाषण से कम नहीं था। आरोपों की झड़ी लगा दी गई-कभी प्रशासन पर साजिश, कभी छवि खराब करने का इल्जाम। यहां तक कि बुलडोजर नीति और सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस तक की याद दिला दी गई।
लेकिन जैसे ही दोबारा पैमाइश हुई और रिपोर्ट ने सारा गणित साफ कर दिया, तो वही तेवर अब बातचीत की तरफ मुड़ते नजर आ रहे हैं। राजनीतिक भाषा में कहें तो “फुल आक्रामक मोड” से “सेटलमेंट मोड” में एंट्री हो चुकी है।

“10 साल पुरानी खरीद, लेकिन कागज आज के”
मेयर साहब का दावा था कि उन्होंने यह जमीन करीब 10 साल पहले खरीदी थी। बीच में पार्टनर बदले, हिस्से बिके और बाउंड्री खड़ी हो गई। लेकिन प्रशासन की नजर में यह पूरा खेल सरकारी जमीन पर ही खेला गया।
यानी कहानी कुछ ऐसी बनी कि “रजिस्ट्री अपनी जगह, हकीकत अपनी जगह।”
“स्कूल की जमीन पर ‘निजी किला’”
जिस जमीन पर यह पूरा विवाद हुआ, वह दरअसल ‘सीएम मॉडल कंपोजिट स्कूल’ के लिए रिजर्व बताई जा रही है। अब सोचिए, जहां बच्चों की पढ़ाई के लिए स्कूल बनना था, वहां पहले से ही ‘पॉलिटिकल प्लॉटिंग’ हो चुकी थी।
प्रोजेक्ट एजेंसी जब मौके पर पहुंची, तो उसे स्कूल की जगह बाउंड्री वॉल मिली—बस फिर क्या था, बुलडोजर ने अपना काम कर दिया।

“तीन दिन की पैमाइश, एक लाइन का सच”
डीएम अनुज कुमार सिंह की निगरानी में तीन दिन तक चली पैमाइश ने आखिरकार सारी बहस खत्म कर दी। रिपोर्ट का निष्कर्ष सीधा है, “जमीन सरकारी है।”
अब इस पूरे घटनाक्रम को देखकर शहर में लोग चुटकी ले रहे हैं – “मुरादाबाद में अब जमीन खरीदने से पहले नक्शा नहीं, शायद बुलडोजर का रूट भी देखना पड़े!”

“राजनीति में ‘बाउंड्री’ से ज्यादा जरूरी ‘ग्राउंड रियलिटी’”
इस पूरे मामले ने एक बात तो साफ कर दी-राजनीति में जमीन पर पकड़ से ज्यादा जरूरी है जमीन की असली स्थिति की जानकारी। वरना बाउंड्री कितनी भी मजबूत हो, एक जेसीबी और एक रिपोर्ट सब कुछ साफ कर देती है।
फिलहाल मेयर साहब बैकफुट पर हैं और मामला बातचीत से सुलझाने की कोशिश में हैं। लेकिन शहर में यह घटना एक मिसाल बन चुकी है, “जहां “दावे ऊंचे थे, लेकिन जमीन खिसक गई।”
