गजरौला की हवा और पानी पर संकट, विषमुक्त भूमि की मांग पर अडिग किसान
अमरोहा। गजरौला क्षेत्र में रासायनिक कारखानों से फैल रहे प्रदूषण के खिलाफ किसानों का बेमियादी आंदोलन लगातार तेज होता जा रहा है। भाकियू संयुक्त मोर्चा के बैनर तले गांव शहबाजपुर डोर में चल रहा धरना दिसंबर के अंतिम दिन बुधवार को 11वें दिन में प्रवेश कर गया। कड़ाके की ठंड और घने कोहरे के बावजूद किसान चट्टान की तरह डटे हुए हैं और विषमुक्त भूमि की मांग पर अडिग बने हुए हैं।
हवा और भूजल में घुला ज़हर, बढ़ रहीं बीमारियां
किसानों का कहना है कि गजरौला की हवा में घुल चुका ज़हर अब जानलेवा होता जा रहा है। कारखानों से निकलने वाले ज़हरीले उत्सर्जन ने न केवल वातावरण को दूषित किया है, बल्कि भूजल को भी पीले और जहरीले रंग में तब्दील कर दिया है। बगद नदी और उसके आसपास का भूजल गंभीर रूप से प्रदूषित हो चुका है, जिससे फसलें प्रभावित हो रही हैं और ग्रामीणों में गंभीर बीमारियों का प्रकोप बढ़ता जा रहा है।

जलस्रोत और जैव विविधता पर खतरा
आंदोलनकारियों ने चिंता जताई कि गंगा क्षेत्र की सदानीरा झीलें, पोखर और तालाब अब पक्षियों की सैकड़ों प्रजातियों के लिए खतरे का संकेत बन चुके हैं। साझा जलस्रोतों के विनाश से ग्रामीण जीवन और पारिस्थितिकी तंत्र पर गहरा असर पड़ रहा है।
अपवित्र गठजोड़ के आरोप, सरकारों पर उदासीनता का ठप्पा
किसानों का आरोप है कि प्रदूषण फैलाने के लिए जिम्मेदार फैक्ट्री मालिकों, राजनेताओं और नौकरशाहों के अपवित्र गठजोड़ के चलते दशकों पुरानी यह समस्या और गंभीर होती चली गई। आंदोलनकारियों का कहना है कि केंद्र और राज्य सरकारें इस जानलेवा संकट पर जानबूझकर आंखें मूंदे हुए हैं।

जनस्वास्थ्य आपात स्थिति बन चुका मुद्दा
भाकियू संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने कहा कि जल, जंगल और जमीन किसानों की पहचान से जुड़ा मुद्दा है। अपनी मिट्टी खो देना आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान खोने के समान है। उन्होंने कहा कि किसानों के सामने दोहरा संकट खड़ा हो गया है—एक तरफ जहरीला भूजल और दूसरी ओर लाइलाज बीमारियों का बढ़ता खतरा। यह अब केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य की आपात स्थिति बन चुकी है।
“जो किसान का नहीं, वो हिंदुस्तान का नहीं”
किसान नेता ने कहा, “जो किसान का नहीं, वो हिंदुस्तान का नहीं। प्रशासन की अनदेखी से हमारा हौसला टूटा नहीं, बल्कि और मजबूत हुआ है। अन्नदाता की जीत जरूर होगी।” वर्ष के अंतिम दिन भी धरना स्थल पर आम आदमी की पीड़ा और व्यवस्था के प्रति असंतोष साफ नजर आया, जबकि आंदोलन में शामिल किसानों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।
विकास मॉडल पर सवाल, संघर्ष अंतिम सांस तक
वक्ताओं ने कहा कि गजरौला क्षेत्र लंबे समय से औद्योगिक प्रदूषण की मार झेल रहा है। साझा संसाधनों के विनाश और तथाकथित विकास मॉडल की सस्ती राजनीति को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया गया। शराब और भूमि के गैर-कृषि उपयोग से समाज और संसाधन दोनों के क्षरण का आरोप लगाते हुए ग्रामीण जीवनशैली को बचाने के लिए एकजुट संघर्ष का संकल्प दोहराया गया।
प्रशासनिक कार्रवाई न होने से आंदोलन उग्र होने की आशंका
किसानों ने बताया कि अब तक प्रशासन की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है, जिससे आंदोलन के और उग्र होने की आशंका जताई जा रही है।

धरने में ये रहे प्रमुख रूप से मौजूद
इस अवसर पर राष्ट्रीय मुख्य सचिव अरुण सिद्धू, तेजपाल सिंह, किरण पाल सिंह, पाटिल चौधरी, नितिन उपाध्याय, अंकुर चौधरी, शान चौधरी, राजीव फौजी, मनोहरलाल सिंह, रघुवीर सिंह, भोपाल सिंह, अनुज सिंह, विष्णु सिंह, संजीव सिंह, नन्हे सिंह, सुनील सिंह, सुरेश सिंह सहित विभिन्न समुदायों के लोग मौजूद रहे।
