अमरोहा। औद्योगिक जल प्रदूषण से घिरे गजरौला में बीते 16 दिनों से चल रहे भारतीय किसान यूनियन (संयुक्त मोर्चा) के आंदोलन ने जब मीडिया की सुर्खियां बननी शुरू कीं, तब जाकर प्रशासन की नींद टूटी। जहरीले पानी से जूझ रहे किसानों की आवाज़ अनसुनी करने के बाद सोमवार को जिलाधिकारी श्रीमती निधि गुप्ता वत्स की अध्यक्षता में गजरौला में एक अहम बैठक आहूत की गई, जिसे हालात की गंभीरता के दबाव में उठाया गया कदम माना जा रहा है।

बैठक में गठित समिति के तहत उपायुक्त उद्योग, उप निदेशक कृषि, मुख्य चिकित्साधिकारी, सहायक अभियंता भू-जल, अधिशासी अभियंता जल निगम (ग्रामीण), क्षेत्रीय अधिकारी उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (बिजनौर) सहित प्रमुख औद्योगिक प्रतिष्ठानों के प्रतिनिधि मौजूद रहे।

डीएम ने निर्देश दिए कि हैंडपंप, बोरबेल, सबमर्सिबल और औद्योगिक इकाइयों के जलस्तर की तत्काल जांच कर कमियों को दूर किया जाए। साथ ही कृषि उत्पादों की सैंपलिंग व जांच के आदेश दिए गए, जिससे जहरीले पानी का असर फसलों पर सामने आ सके। मुख्य चिकित्साधिकारी को निर्देशित किया गया कि प्रभावित गांवों में गांव-गांव स्वास्थ्य जांच शिविर लगाए जाएं, ताकि दूषित जल से फैल रही बीमारियों की वास्तविक स्थिति सामने आ सके।

वहीं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सभी औद्योगिक इकाइयों की सीटीपी (कॉमन ट्रीटमेंट प्लांट) की जांच के निर्देश दिए गए, जबकि जल निगम को सभी ब्लॉकों में खराब और उथले हैंडपंप दुरुस्त कराने के आदेश दिए गए। जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया कि जल प्रदूषण की इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए सभी विभाग समन्वित अभियान के रूप में कार्य करें और समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

हालांकि सवाल यह है कि जब किसान 16 दिन से सड़क पर हैं, तब क्यों नहीं जागा प्रशासन? क्या यह कार्रवाई स्थायी समाधान बनेगी या सिर्फ आंदोलन के दबाव में उठाया गया औपचारिक कदम साबित होगी—यह आने वाला वक्त बताएगा। फिलहाल गजरौला के किसान साफ पानी और जवाबदेही की मांग पर अडिग हैं।
