इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी के कारण उत्पन्न हुई स्वास्थ्य त्रासदी जनवरी 2026 में एक गंभीर विवाद का रूप ले चुकी है। इस मामले में मुआवजे की संख्या (18) और आधिकारिक मृत्यु दर 7 के बीच का बड़ा अंतर प्रशासन की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर रहा है।
1. आंकड़ों में भारी अंतर
- आधिकारिक आंकड़ा: स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन ने कोर्ट में केवल 7 मौतों की पुष्टि की है।
- मुआवजा: विरोधाभास तब शुरू हुआ जब इंदौर कलेक्टर ने पुष्टि की कि मुख्यमंत्री के निर्देश पर 18 प्रभावित परिवारों को ₹2-2 लाख का मुआवजा दिया गया है।
- स्थानीय दावे: स्थानीय निवासियों और विपक्षी दलों के अनुसार, मौतों की वास्तविक संख्या 20 तक पहुँच चुकी है।
2. त्रासदी का मुख्य कारण
जांच में सामने आया है कि एक पुलिस चौकी के पास बने सार्वजनिक शौचालय (बिना सेप्टिक टैंक वाला) से निकलने वाला मल-मूत्र सीधे मुख्य पेयजल पाइपलाइन में मिल रहा था। MGM मेडिकल कॉलेज की जांच में पानी के नमूनों में मल संदूषण (Faecal Coliform) की पुष्टि हुई है, जो सुरक्षित स्तर से कई गुना अधिक था।
3. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने इस घटना पर कड़ी नाराजगी जताई और इसे “असंवेदनशील” करार दिया।
- मुख्य सचिव तलब: कोर्ट ने मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव अनुराग जैन को 15 जनवरी 2026 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होकर जवाब देने का निर्देश दिया है।
- छवि पर असर: कोर्ट ने टिप्पणी की कि इस घटना ने देश के सबसे स्वच्छ शहर (Indore) की छवि को राष्ट्रीय स्तर पर धूमिल किया है।
4. वर्तमान स्थिति और प्रशासनिक कार्रवाई
- अस्पताल की स्थिति: वर्तमान में लगभग 56 से अधिक मरीज विभिन्न अस्पतालों में भर्ती हैं, जिनमें से 9 मरीज आईसीयू (ICU) में गंभीर अवस्था में हैं।
- कार्रवाई: लापरवाही बरतने के आरोप में नगर निगम के एक जोनल ऑफिसर और सहायक अभियंता को निलंबित कर दिया गया है।
- सरकार का पक्ष: मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा है कि सरकार आंकड़ों के बजाय मानवीय संवेदना और पीड़ितों की मदद को प्राथमिकता दे रही है।
यह त्रासदी न केवल बुनियादी ढांचे की विफलता को दर्शाती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि कैसे महीनों से मिल रही शिकायतों को नजरअंदाज करना घातक साबित हो सकता है।
