मुरादाबाद। उदीषा साहित्य एवं संस्कृति महोत्सव का चौथा दिन मुरादाबाद के सांस्कृतिक जीवन का जीवंत और सशक्त चित्र बनकर सामने आया। सुबह से ही आयोजन स्थल पर दर्शकों की आवाजाही शुरू हो गई थी, जो देर शाम तक बनी रही।

सत्रों में भरे हुए श्रोता, मंचों पर सार्थक संवाद और परिसर में फैली रचनात्मक हलचल यह दर्शा रही थी कि उदीषा अब केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि शहर की साझा सांस्कृतिक चेतना का उत्सव बन चुका है।

दिन के प्रमुख सत्रों में प्रशासन और साहित्य पर आयोजित संवाद विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। संभल के जिलाधिकारी डॉ. राजेंद्र पैंसिया ने बच्चों में बढ़ते स्क्रीन टाइम पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि खेल, दौड़-भाग और सामाजिक संपर्क बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए आवश्यक हैं।

उन्होंने कहा कि डिजिटल उपकरणों के उपयोग को संतुलित करना अभिभावकों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। लेखक आशुतोष गर्ग ने साहित्य की सामाजिक भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि लेखक का काम समाज में चेतना जगाना है, जबकि समाधान की दिशा प्रशासन तय करता है। सुचिता मलिक ने लेखन की लैंगिक पहचान पर कहा कि रचना के समय लेखक केवल लेखक होता है।
टेंपल इकोनॉमिक्स विषय पर ऋतुराज मिश्र और संदीप सिंह ने आस्था, दर्शन, समाज और अर्थव्यवस्था के संबंधों पर विचार रखे। वक्ताओं ने कहा कि धार्मिक स्थल केवल पर्यटन केंद्र नहीं, बल्कि जीवित सभ्यता और सामाजिक संतुलन के आधार हैं।

हिडन हिंदू सत्र में अक्षत गुप्ता ने बच्चों को धर्म और सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि यह जिम्मेदारी सबसे पहले माता-पिता की है।

एआई और रचनात्मकता विषय पर डॉ. प्रियंका सचदेवा ने कहा कि तकनीक रचनात्मकता का विकल्प नहीं, बल्कि उसका सहायक उपकरण हो सकती है। मुरादाबाद का गद्य और मुरादाबाद माटी का संगीत सत्रों में वक्ताओं ने शहर की साहित्यिक और सांगीतिक परंपरा पर विस्तार से चर्चा की। शाम को प्रस्तुत नाटक बिदेसिया ने दर्शकों की खूब सराहना बटोरी।

कव्वाली से सजी रूहानियत भरी शाम
शाम को नियाज़ी ब्रदर्स की कव्वाली ने माहौल को आध्यात्मिक उल्लास से भर दिया। “भर दे झोली मेरी या मोहम्मद” और “दमादम मस्त कलंदर” पर पूरा पंडाल झूम उठा और देर रात तक तालियों की गूंज बनी रही।

लोकसंस्कृति का जीवंत मंच
भिखारी ठाकुर मंच पर दिनभर देश के विभिन्न राज्यों से आए कलाकारों ने लोकनृत्य और पारंपरिक कलाओं की प्रस्तुतियां दीं, जहां दर्शकों की भीड़ लगातार बनी रही।

उदीषा परिसर में लगे बुक स्टॉल, हस्तशिल्प बाजार, आर्ट गैलरी और बाल-जोन दर्शकों के आकर्षण का केंद्र रहे। बढ़ती सहभागिता यह संकेत दे रही है कि उदीषा साहित्य एवं संस्कृति महोत्सव मुरादाबाद के नागरिक और सांस्कृतिक जीवन का एक महत्वपूर्ण पर्व बन चुका है।
