अमरोहा। गजरौला के शहबाजपुर डोर स्थित नाईपुरा गांव में दूषित भूजल के खिलाफ किसानों का आक्रोश थमने का नाम नहीं ले रहा है। 44वें दिन भी भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के बैनर तले किसान बेमियादी धरने पर डटे रहे। हाथों में बोतलों में भरा काला, बदबूदार पानी लहराते हुए किसानों ने नारे लगाए – “योगी जी आओ और ये पानी पीकर देखो”। यह नजारा सरकार के दावों और ज़मीनी हकीकत के बीच गहरी खाई को उजागर करता दिखा।
धरने को संबोधित करते हुए भाकियू संयुक्त मोर्चा के प्रदेशाध्यक्ष रामकृष्ण चौहान ने सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि सरकार एक ओर जनता से टैक्स वसूल रही है और बदले में दे रही है-ज़हरीली हवा, ज़हरीला पानी, कैंसर और ऊपर से नकली दवाइयां। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा, “पहले कैंसर बांटो, फिर उसकी दवाई सस्ती करो-यही है आपकी दूरदृष्टि की असली मिसाल।”
किसान नेताओं ने केंद्रीय बजट 2026-27 को सिरे से खारिज करते हुए इसे “एआई बजट – आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस नहीं, आर्टिफिशियल राहत” करार दिया। उनका कहना था कि किसान की दोगुनी आय के वादे हवा-हवाई साबित हो रहे हैं, जबकि ज़मीन पर किसान और युवाओं की थाली सूनी पड़ी है। संसद में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण “ऑरेंज इकॉनमी” का जश्न मना रही हैं, लेकिन गजरौला के नाईपुरा में किसान आज भी दूषित पानी के खिलाफ सड़क पर बैठा है।
किसानों ने सवाल उठाया कि “जहां पहले एक कमाने वाला पूरे परिवार को संभाल लेता था, आज पूरा परिवार नौकरी करता है, फिर भी ईएमआई और कर्ज़ के बोझ तले दबा है। डीज़ल, पेट्रोल, महंगाई, बेरोज़गारी- क्या यही है विकसित भारत 2047 का रियल फ़िल्टर?”
भाकियू संयुक्त मोर्चा के अल्पसंख्यक मोर्चा प्रभारी एवं मंडलाध्यक्ष एहसान अली ने साफ शब्दों में कहा कि किसानों की मांग है कि नाईपुरा क्षेत्र में जल-जंगल-जमीन को दूषित करने वालों पर सख़्त कार्रवाई, प्रभावित किसानों को उचित मुआवज़ा, बजट में संशोधन कर किसान और खेती-बाड़ी के अनुकूल फैसले लागू किए जाएं।
उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा, “वरना ये ‘ऑरेंज इकॉनमी’ नहीं, ‘ऑल रेड पॉकेट’ वाली हकीकत बनी रहेगी। ज़ुल्म की एक हद होती है, लेकिन आपकी नीतियों की कोई हद नहीं।”
धरने में समरपाल सैनी, रामप्रसाद सैनी, ओमप्रकाश, होमपाल सिंह, गंगाराम, विजय सिंह, अंकित कुमार, अशद अली, जगन सिंह, शीशपाल सैनी, अदनान अली, अरुण कुमार सहित बड़ी संख्या में किसान मौजूद रहे।
कुल मिलाकर नाईपुरा का यह आंदोलन अब सिर्फ दूषित पानी का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि सरकार की नीतियों के खिलाफ किसानों की खुली बगावत बनता जा रहा है।
