अमरोहा। गजरौला के औद्योगिक क्षेत्र में फैलता ज़हरीला पानी अब केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि सरकारी नाकामी, प्रशासनिक संवेदनहीनता और राजनीतिक धोखे का जीवंत दस्तावेज बन चुका है। जिला प्रशासन और राज्य सरकार की चुप्पी के खिलाफ शहबाजपुर डोर गांव में 47वें दिन भी किसानों का धरना जारी रहा। भारतीय किसान यूनियन (संयुक्त मोर्चा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने साफ शब्दों में कहा कि नाईपुरा का ज़हरीला पानी सरकार के विकास मॉडल पर करारा तमाचा है।
उन्होंने कहा, “जीडीपी के आंकड़े चमकाए जा सकते हैं, लेकिन जो भरोसा टूट गया है, उसे कोई बजट नहीं जोड़ सकता।”

हाथ-पंप उगल रहे ज़हर, खेत और इंसान दोनों बीमार
धरनास्थल से उठती आवाज़ों ने सरकार के तमाम दावों की हवा निकाल दी। नाईपुरा और आसपास के गांवों में फैक्ट्रियों से निकलने वाला रासायनिक अपशिष्ट सीधे भूजल में घुल रहा है। नतीजा यह है कि हाथ-पंपों से पीला, बदबूदार और जहरीला पानी निकल रहा है। फसलें नष्ट हो रही हैं, पशुधन मर रहा है और ग्रामीण गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं—लेकिन सत्ता के गलियारों में यह त्रासदी फाइलों में दबी हुई है।
नमूने लिए गए, रिपोर्ट गायब: सच से भागती सरकार
किसानों ने सवाल उठाया कि महीनों पहले मिट्टी और पानी के नमूने लिए गए, लेकिन उनकी रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक क्यों नहीं की गई? क्या इसलिए कि सरकारी दावों का झूठ बेनकाब न हो जाए? यह चुप्पी प्रशासन की लापरवाही नहीं, बल्कि साजिशन ढंग से सच्चाई छिपाने का संकेत है।

नरेश चौधरी ने आरोप लगाया कि यह सब नौकरशाही की मनमानी और सत्ता की संरक्षण नीति का नतीजा है। फैक्ट्रियों को छूट दी जा रही है और किसानों को मरने के लिए छोड़ दिया गया है। केंद्र और राज्य, दोनों सरकारों के पास किसानों के लिए न तो नैतिक साहस है और न ही कोई भरोसेमंद विकास रोडमैप।
पहचान की राजनीति में घुटता पानी, मिट्टी और किसान
धरने में वक्ताओं ने कहा कि राज्य में पहचान और ध्रुवीकरण की राजनीति इतनी हावी हो चुकी है कि पानी ज़हर बन जाए, खेती चौपट हो जाए और लोग बीमार पड़ जाएं—तब भी सत्ता को फर्क नहीं पड़ता। मिट्टी, पानी, खेती, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे असली मुद्दे जानबूझकर हाशिये पर धकेले जा रहे हैं।

प्रमुख सचिव अरुण सिद्धू, प्रदेशाध्यक्ष रामकृष्ण चौहान (अल्पसंख्यक मोर्चा प्रभारी) और मंडलाध्यक्ष एहसान अली ने कहा कि नीति की जगह अब राजनीतिक ध्रुवीकरण ने ले ली है। ऊंची जीडीपी को ढाल बनाकर बेरोजगारी, बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं और बढ़ती असमानता से ध्यान हटाया जा रहा है। हजारों करोड़ रुपये इमेज बिल्डिंग पर खर्च किए जा रहे हैं, जबकि मीडिया की आज़ादी सिमटती जा रही है, जिससे सत्ता पर सवाल पूछने की ताकत कमजोर हो रही है।
किसानों की चेतावनी: उपेक्षा विस्फोट को जन्म देती है
धरनारत किसानों ने दो टूक कहा कि पारदर्शिता, सहमति और भरोसे के बिना औद्योगिक विकास केवल एक छलावा है। प्रशासन को चेतावनी दी गई कि उपेक्षा सबसे खतरनाक विरोध होती है—जो पहले खामोश रहती है और फिर अचानक उफान पर आ जाती है। अगर अब भी ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो इसके परिणामों की पूरी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।

धरने में बड़ी संख्या में महिला और पुरुष किसान मौजूद रहे। प्रमुख रूप से शानू चौधरी, होमपाल सिंह, रामप्रसाद, ओमप्रकाश सिंह, सोमपाल सिंह, असद अली, समरपाल सैनी, गंगा राम, कृष्णा रानी, नूरजहां सहित विभिन्न किसान जत्थेबंदियों के प्रतिनिधियों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है।
